कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( ११७१ )
पांच तत्त्वको जानन वारा । सदा सो इन पांचोंते न्यारा ॥ मन इन्द्री निरगुनते पारा । आप भूलि गल फन्दा डारा ॥
सोरठा-फन्दपरा जब जीव, अपनो रूपबिसारके । दृढन लागा पीव, विविधि प्रकारकी यतनकरि ॥
चौपाई
जिमि कपिकण्ठलगी जंजीरा । बँधा रहै बांसके तीरा ॥ कबहुंके बांस ऊपर चढ़ि आवै । कबहुंके हेठ उतरि सो आवै ॥ उतरा चढ़ि न छूटै ताकौ । दृढ़ जंजीर परी गल वाको ॥ तिमि जिव कमहीक्रम लहदेही । बिनसतगुरु पद पाव न येही ॥ जब जंजीर गलेकी छूटै । तब जिवरूप आपनो जूटै ॥ वपु विज्ञान शिखरकी चोटी । देही थूल मूल महि मोटी ॥ मूलते जब चोटी चढ़ि जावै । निज प्रतिबिंबै ध्यान लगावै ॥ ऊपर हेठ लख मोर स्वरूपा । झाँई भेद न जाने गुपा ॥ यही देहु विज्ञान कहावै । झाँई निरखि अपनको गावै ॥ जैसे तप्त तीख अंगारा । पर ताहीपर क्रमक्रम छारा ॥ ज्ञान अग्नि जब अन्त बुझाई । थूल शरीर बहुरि जिव पाई ॥ पुनि करि यत्न अग्नि उदगारा । तब विज्ञान देह सौ धारा ॥ होय जाय इमि कालहि पाई । आवागौन सूत्र नहि जाई ॥ जब कपि कंठ कड़ी गुरु छोरै । तब भ्रम धोखा होय न भोरै ॥ बन्धन सो विज्ञान कि देही । आवागौन न छूटै जेही ॥ इहां लगि वेद पुरान बखाना । आगे मरम न कोई जाना ॥ दशों दिशा दश सूरज होई । तब छाया नहि दूरसै कोई ॥ छाया माया होय विनाशा । जीवहि निजुस्वरूप तब भासा ॥ दशों दिशा जब रवि खरधारा । प्रलय होय तबही संसारा ॥ जहँ संसार तहाँ नहि ज्ञाना । जहाँ ज्ञान तहँ जक्त नसाना ॥