कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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जबलों पारख पद नहिं पावै । तबलों आवागौन समावै ॥ ताते मनहिं विचार करीजै । कच्छी तत्त्वदेह किमि छीजै ॥ पक्की तत्त्व बहुरि जिहि पैये । कह संग्रह कह त्याग करैये ॥ पांचो तत्त्व पचीस प्रकृती । भर्म रूप सबही ये बर्ती ॥ जाग्रित स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । सो सब भर्म भावकी पुरिया ॥ जैसे जीव त्याग निज भूमी । चार खानिमै रहा सो झूमी ॥ ब्रह्मजीव जग दीसो माया । इत्यादिक बहु नाम धराया ॥ तैसे स्वसंवेद की बानी । धरि बहुरूप जक्त बिहरानी ॥
इति
अथ तत्त्वमसि तीनोंपद मिथ्यावर्णन-चौपाई
जान ज्ञान द्वैभेद बखाना । स्वसंवेद अस करे प्रमाना ॥ मलसंयुक्त ज्ञानको वरना । सर्वजीवमें सो संचरना ॥ ज्ञान अमल विकार कहावै । ज्ञानहि मात्र जीव बतलावै ॥ मेघ झंप जिमि भानु लोपाई । मुख न दीख दरपन लगिकाई ॥ तैसे जान भर्मकी ओटा । सत्य न भासै भासै खोटा ॥ पौन प्रसंग पटल घन बूरी । स्वतह भानु बहुडिस रह पूरी ॥ भानुउदय नहिं दरसै तारा । ज्ञानउदय नहिं यह संसारा ॥ अमल अखंड उदय दिनकरके । रहे न भर्मत तच्छन सरके ॥ जानति माया झंपन जबही । ज्ञान नाम कहिये सो तबही ॥ ज्ञानहि मात्र जीवको कहई । विना ज्ञान सब भूत्तक अहई ॥ जक्त मांह जेते वैपारी । जीव जमावै पार पसारी ॥ बिना जमावै पार न होई । खर्च कहांते करिहै कोई ॥
सत्यकबीर बचन
सारसी-कहै कबीर विचार, यह निर्णय परमान । जीव जमा जाने बिना, सबै खरचमें जान ॥