कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९८० )
बोधसागर
७२
जबलों पारख पद नहिं पावै । तबलों आवागौन समावै ॥ ताते मनहिं विचार करीजै । कच्छी तत्त्वदेह किमि छीजै ॥ पक्की तत्त्व बहुरि जिहि पैये । कह संग्रह कह त्याग करैये ॥ पांचो तत्त्व पचीस प्रकृती । भर्म रूप सबही ये बर्ती ॥ जाग्रित स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । सो सब भर्म भावकी पुरिया ॥ जैसे जीव त्याग निज भूमी । चार खानिमै रहा सो झूमी ॥ ब्रह्मजीव जग दीसो माया । इत्यादिक बहु नाम धराया ॥ तैसे स्वसंवेद की बानी । धरि बहुरूप जक्त बिहरानी ॥
इति
अथ तत्त्वमसि तीनोंपद मिथ्यावर्णन-चौपाई
जान ज्ञान द्वैभेद बखाना । स्वसंवेद अस करे प्रमाना ॥ मलसंयुक्त ज्ञानको वरना । सर्वजीवमें सो संचरना ॥ ज्ञान अमल विकार कहावै । ज्ञानहि मात्र जीव बतलावै ॥ मेघ झंप जिमि भानु लोपाई । मुख न दीख दरपन लगिकाई ॥ तैसे जान भर्मकी ओटा । सत्य न भासै भासै खोटा ॥ पौन प्रसंग पटल घन बूरी । स्वतह भानु बहुडिस रह पूरी ॥ भानुउदय नहिं दरसै तारा । ज्ञानउदय नहिं यह संसारा ॥ अमल अखंड उदय दिनकरके । रहे न भर्मत तच्छन सरके ॥ जानति माया झंपन जबही । ज्ञान नाम कहिये सो तबही ॥ ज्ञानहि मात्र जीवको कहई । विना ज्ञान सब भूत्तक अहई ॥ जक्त मांह जेते वैपारी । जीव जमावै पार पसारी ॥ बिना जमावै पार न होई । खर्च कहांते करिहै कोई ॥
सत्यकबीर बचन
सारसी-कहै कबीर विचार, यह निर्णय परमान । जीव जमा जाने बिना, सबै खरचमें जान ॥
७३
जीवधर्मबोध
( १९८१ )
चौपाई
जो दीसै सबही विनसाई । जो विनसै सो जिव न कहाई ॥ जीव सोई जीवै तिहुकाला । जड़ चेतन ते सदा निराला ॥ आप मानि बंधनमें आया । भ्रमकरि तत्त्वमसी ठहराया ॥ तत्त्वमसी तिहुँपद है जोई । आवागौन मूल है सोई ॥ ततपद ईश्वर त्वं जिवरासी । असि पदक है ब्रह्म अविनासी ॥ ततपद ज्ञान है त्वं अज्ञाना । असि पद वेद ब्रह्म अज्ञाना ॥ वस ब्रह्मांड ब्रह्मसो ईसा । जिव अभिमानी पिंडमें दीसा ॥ असि पद जो दोनोंमें सनई । यमअनंद कछु कहत न बनई ॥ ज्ञानी अज्ञानी विज्ञानी । ततसागर त्वं सर असि पानी ॥ नामरूप मिथ्या है दोई । आत्मा एक जल सबमें सोई ॥ मानन्दी यह तीन प्रकारा । मानि मानि निज बन्धन डारा ॥ यही तीन है जिवको फांसा । षट्देहीमें कीनो बासा ॥ दोविधि ज्ञान द्वैविधि अज्ञाना । दोय भांति विज्ञान बखाना ॥ यक विशेष अपरोक्ष बतावो । दुतियोको परोक्ष कहि गावो ॥ निर उपाधि अपरोक्ष बखाना । सहित उपाधि परोक्ष प्रमाना ॥
इति
अथ त्वंपद द्वैभांतिको अज्ञानवर्णन-चौपाई
जो विशेष अपरोक्ष कहावै । विषयी जीवनके मन भावै ॥ विषय आसक्त जीव जब रहई । जाति पांति कुलकानि न गहई ॥ भोग मदामिष परतिय संगा । विषयिन सङ्ग अनंग तरंगा ॥ वेद शास्त्र मानै नहीं कोई । गति अपरोक्ष कहावे सोई ॥ सो अपरोक्ष दोय विधि वरना । परइच्छा निज इच्छा चरना ॥ परइच्छा जो हो अज्ञाना । सो समान अधिकरण बखाना ॥ निज इच्छा अज्ञान गहीजै । सो विशेष अधिकरण कहीजै ॥
( १९८२ )
बोधसागर
७४
गुरुजनकी कछु कानि न माने । वेद शास्त्रकी निन्दा ठाने ॥ गुरु सतगुरुको आदर नाही । ईश्वर देव कौन कह आहीं ॥ वामपंथ इच्छा आचरई । बाद अन्यथा सबसे करई ॥ जो कोइ ताको ज्ञान सुनावै । ताते उठिके झगरन धावै ॥ रस शृङ्गार गीत भल गावै । विषय सराह स्वाद मन लावै ॥ निंदै ज्ञान भक्ति सतसंगा । सदाकाल विषयन रतिरंगा ॥ मृगनैनी तजि भे बैरागी । इन समान नहिं कोउ दुर्भागि ॥ साधु संग करि नर बौराना । ताते विषय स्वाद नहिं जाना ॥ कर्महीन दारिद्री येहा । हम ज्ञानी सब गुनको गेहा ॥ जो कछु है सो है यह देही । इन्द्री भोग देह भल हेही ॥ मुये पिछार मुक्ति सब पाई । और सबहि जग भ्रम उपजाई ॥ जैसे वृक्षते पत्ता टुटता । फेर न सो तरुवरमें जुटता ॥ जैसे मुये मुक्त सब होई । और मुक्ति कतहुँ नहिं कोई ॥ यह बिसे अपरोक्ष अज्ञाना । विषयी जीवनके मनमाना ॥ अब दुतियेको वरनन कीजै । तेहि परोक्ष अज्ञान कहीजै ॥ सो परोक्ष अज्ञान है जोई । समान अधिकरन कहावे सोई ॥ जो समान अधिकरन कहावै । कर ताको दूजा बतलावै ॥ यंत्र मंत्र अरु देवी देवा । विविधि प्रकार करे सो सेवा ॥ तीरथ व्रत अस मूरत पूजा । कर्म करहि ईश्वर लखि दूजा ॥ वेदकि विधि सब करे अचारा । क्रम उपात्ताको व्यौहारा ॥ कर्मोमाह दोय विधि जाना । यक विशेष कह एक समाना ॥ मुन धन धान्यलाभ जग हेता । पूजा सेवामें चित देता ॥ निज मनोर्थहिन जो मन लावै । सो विशेष अधिकरण कहावै ॥ कर्ता हेत कर्म जो करिये । मुक्ति वासना चितमें धरिये ॥ शम दमादि अरु योग समाधू । तन मन बहुविधि साधे साधू ॥
७५
जीवधर्मबोध
( १९८३ )
यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥ नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥ दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥ अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥ परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥ याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥ द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥
इति त्वंपद अज्ञान
अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई
ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥ सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥ ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥ निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥ तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥ सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥ तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥ सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥ सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥ जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥ होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥ निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥ सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥ त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥ ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥ यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥
( १९८४ )
बोधसागर
७६
तीन काल कोई नहिं भासा । त्रिपुटी सकलको होय बिनासा॥ ज्ञानाज्ञान गेय नहिं कोई । ध्याता ध्यान ध्येय ना होई ॥ आपन भाव रहै तिहुँ काला । द्वैत उपाधि नास्ति जंजाला ॥ यही ज्ञान अपरोक्ष कहावा । सो ज्ञानी शिवरूप बतावा ॥ योग समाधिसे जो मन मारे । मध्यम पक्ष सो वेद उचारे ॥ तामे कसर वेद निर्धारा । परो अविद्याको अंधियारा ॥
इति तत्पद
अथ अस्तिपद विज्ञान द्वैविधि वर्णन चौपाई
जानि बूझि जड़ वृती जो धारा । जस उनमत्त महा मतवारा ॥ यहिविधि सहजदसा जब गहई । एक अनेकन भ्रम कछु रहई ॥ महदानन्द मगन मन होई । याहूमें प्रकार है दोई ॥ जहँ विज्ञान दशा रह आई । सो विज्ञान हंस कहलाई ॥ कहवे मात्र बानीको ज्ञाना । सो मिथ्या विज्ञान बखाना ॥ दुतिये सो विज्ञान कहाई । जहां तहां आपै रह छाई ॥ द्वैतभाग कहुँ नहिं रहई । कारन कारज आपै रहई ॥ आपै बोले आप बोलावै । आपै डोलो आप डोलावै ॥ करे करावै आपै आपू । द्वैतभाव कतहुँ नहिं थापू ॥
इति
अथ स्वसंवेदमते चतुर्थपारखपदवर्णन-चौपाई
यहि विधि तीन भूमिका भाषी । चौथि भूमि पारखपद राखी ॥ तीन भूमिका है भ्रम भासा । चौथे परख काटे जिव फांसा ॥ तत्त्वमसीको ज्ञान जो गहता । तावमसीसे न्यारा रहता ॥ जैसे गुँगेने गुड़ खाया । बाक बिना कह स्वाद बताया ॥ तत्त्वमसाको ज्ञान जो धारी । जानि बूझि सो भयो सुखारी ॥ गुंगा गुड़को स्वाद जो गहई । सो तो गुड़से न्यारा रहई ॥
७७
जीवधर्मबोध
( १९८५ )
स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥ नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥ मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥ तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥ झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥ जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥ सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥ घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥ छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥ चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥ छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥ पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥ पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥
सत्यकबीर बचन—शब्द
यह जग पारख बिना भूलाना । निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥ द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना । आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥ सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना । जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥ छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना । बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥ घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना । सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥
( १९८६ )
बोधसागर
७८
करहु विचार सकल मिलि ऐसो भेष विविधि बिधि बाना । कहै कबीर कोइ गुरुगम पावै पहुँचे ठौर ठिकाना ॥
इति पारखभूमि
सोरठा-ज्ञानको मूल विचार, बिन विचारको ज्ञान गह ।
हृदय घोर अँधियार, सार असार न परखकर ॥
ताते बारहि बार, मनमें भूले विचारकर ।
कोहें को संसार, कौनि भाँति कहते भया ॥
करता कारण कौन, यह समूह जो दृश्य है ।
परखी लीजिये तौन, निज विचार द्वारे सकल ॥
देह सदा जडरूप, चित्त फुरित चैतन्य है ।
कर्मकिया भ्रमकूप, जड़ चैतनते मैं अलग ॥
चौपाई
अस विचार आवै हिय जनही । तब गह सार भर्म भय भनही ॥
जहैं लगि जगमें कथा कहानी । सकल जीवकी बात बखानी ॥
सर्वज्ञौ अलपज्ञ समाजा । जीवहि रंक जीव ही राजा ॥
जीवहि गिरही जीव भिखारी । जीवहि पुरुष जीवही नारी ॥
जीव ब्रह्म माया जगदीशा । जीवहि स्मर लक्ष्म रजनीशा ॥
जीवहि क्रूर सुगम सुरबाना । जीवहि जल थलमें बिहराना ॥
जीवहि काल युवा अरु बूढ़ा । जीवहि ज्ञानी जीवहि मूढ़ा ॥
जीव समष्टि व्यष्टि कहलावै । जीवहि पोषै सोष उपावै ॥
जीवते इतर कतहुँ कछु नाहीं । उर्थ मध्य अथ जीवहि आहीं ॥
जीवको सबहीं खेल विहारी । ताकी दशा अवस्था न्यारी ॥
ब्रह्म कहूँ बिन जीव न होई । जीव बिना जिव जिये न कोइ ॥
जौपै ब्रह्म जीव बिन होता । कैसे जीव बीज सो बोता ॥
जीवकर्म निर्जीव न करई । जीव बिना जिवकाज न सरई ॥
७९
जीवधर्मबोध
(१९८७)
जीवभूमिका पर सब ठाढ़े । कहूँ तुच्छ कहूं गुणगण बाढ़े ॥ कर्म किये सर्वज्ञ हो सोईं । जैसे मूरख पंडित होईं ॥ सम्पति विपतियें जिव एक सारा । भिन्न भिन्न पदवी सो धारा ॥
दोहा-अल्पज्ञता जो जीवकी, सर्वज्ञता जो ईश ।
दूर दोहूको कीजिये, जीवहि विश्वा वीश ॥
चौपाई
चारों खानि जीव यक रासी । सबको लगी कर्मकी फांसी ॥ नरतन यही ज्ञान अधिकारी । ताते जीव भ्रम तिभिर बिड़ारी ॥ कञ्चनको भूषण बहु करही । न्यारो न्यारो नाम सो धरही ॥ भूषणदशा स्वर्ण जब लहिये । तब क्या कंचन नाम न कहिये ॥ धातु रूपहू कहिये कंचन । भूषणहू पुनि सोईं विरंचन ॥ कंचन आहि सत्य यक ताते । जो कछु चाहे रचिये बातें ॥ ऐसे जीव धातुसे सब है । माया ब्रह्मादिक बहु ढब है ॥ सांचो जीव जमा यक अहई । और खर्च बहु बानी बहई ॥ सूक्ष्म थूल जीवकी करनी । अज्ञ तज्ञ कछु भिन्न न वरनी ॥ पारख गुरु कोइ दूँदन जावै । जीवते इतर ताहि नहिं पावै ॥ पारख सदा जीवके पाहीं । प्रकट होत भ्रम तम बिनसाहीं ॥ भल विचार करिहैं जे प्रानी । सारासार सोईं पहिचानी ॥ जेते हंस पारख पदधारा । पारख पाय न पुनि संसारा ॥ अलख कि गति कहूँ लखी न जाई । पारख कृपाते सो दरसाई ॥
सत्यकबीर बचन-शब्द
साधो सतगुरु अलख लखाया, जाते आप आप दरसाया ॥ बीज मध्य ज्यों तरुवर दरसै, वृक्ष मध्य ज्यों छाया । आतममें परमातम दरसे, परमातममें माया ॥
(१९८८)
बोधसागर
८०
ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा । निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥ ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥ श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥ आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया । सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥ आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई । झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥ छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है । सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥ परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है । सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥
इति
अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई
आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥ पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥ दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥ पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥ प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥ पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥ जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥ तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥
८१
जीवधर्मबोध
( १९८९ )
तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥ सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥ सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥ बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥ प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥ देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥ दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥ सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥ तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥ तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥ चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥ वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥ इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥ कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥ हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥ तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥ जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥ लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥ लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥ लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥ वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥ काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥ वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥ देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥ इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥
( १९९० )
बोधसागर
८२
आवत देख जो विषयबयारी । इन्द्री पटल सो देहि उघारी ॥ विषयानन्द जीव जब होई । तब शुभ करनी करे न कोई ॥ जब चहुलाज लंघि जिव जावै । बड़भागी कोइ प्रभु पद पावै ॥ अन्नमय यह कोष बखाना । जामैं जक्त जीव गल ताना ॥ प्राणमयी कोष याके आगे । विविधिप्रकार पौन संग लागे ॥ प्राण अपान समान उदाना । व्यानो नाग कूर्म कहि गाना ॥ किर्कल देवोदत्त धनंजय । ये सब पौन हैं कोष प्राणमय ॥ जेहि औसर जिव ऐसो कहई । प्राण हमारो तीक्ष्ण बहई ॥ प्राण पौनको स्वतह सुभाऊ । आपासो आरोप कराऊ ॥ गुदा अपान प्रवेश कराया । पवन सुभावन जीव सुभाया ॥ हृदय समान उदान सिरोई । व्यान अन्नपाचक है सोई ॥ नाग डकार कूर्म हग खोले । किर्कल छीक स्वतह सो बोले ॥ देवदत्त जसुहाई पूजै । मृतक शरीर धनंजय सूजै ॥ इतने इतर पौन बहुवादी । अंगफर्कन अफरन हिचक्यादी ॥ पौन कर्म सब मानै आपा । कोष प्रानमय बंधन थापा ॥ कोष मनोमय तासु अवांतर । पुनि हंकार कहे ताते पर ॥ शुभ और अशुभकर्म जो कछु कर । पुन्य पाप व्यौहारादिक नर ॥ सो सब मन इन्द्रीके करतब । कोष विज्ञानमयी कहिये अब ॥ पंच ज्ञान इंद्री छठये बुधि । तासु अवांतरचित्त सहित सुधि ॥ परमारथ सब उत्तम करनी । सो सुभाव सब इनको बरनी ॥ जिवसो कर्म आपनो धरई । कोष विज्ञानमय बंधन करई ॥ पुनि अनंदमय कोष पर तेही । बुद्धिको ऐसो ज्ञान भयो जेही ॥ हौमैं करि जिव करे बखाना । आपको बड़ अनंद हम जाना ॥ सो अनंद बंधन जिव केरा । कोष अनंदमयी यह टेरा ॥ पांचो कोष अवस्था पांचो । जागृतरूप अनन्तमय बांचो ॥
८३
जीवधर्मबोध
( १९९१ )
प्राण मनो विज्ञान जो तीनी । स्वप्न स्वरूप तिन्है कहि दीनी ॥ पुनि अनंदमय कोष जो आही । रूप सुषुप्ती कहिये ताही ॥ जाग्रत रजगुन रूप कहीजै । सतगुन रूप स्वप्न कहिदीजै ॥ तमगुन रूप सुषुप्ति कहावै । देहमन्त्री गुन सुभाव बतावै ॥ पुण्यदया वांछा रजगुनकह । पुन्य पिछार विषाद तमो यह ॥ वांछा रहित सतोगुन जानी । त्रिगुन कर्म नानाविधि मानी ॥ जिव अज्ञानते आपको कहई । पुण्यपाप सब मेरो अहई ॥ ज्ञानी गुनन सुभाव सो जाने । अज्ञानी अपनो करि माने ॥ यहि बिधि जेते तनके कर्मा । सो सब मन इंद्रिके धर्मा ॥ पाँचो तत्त्व त्रिगुनते भयऊ । गुन आज्ञा शक्तिसे कहेऊ ॥ चित्तसे अज्ञान शक्ती होई । मन अरु चित्त भेद नहिं कोई ॥ सर्वे कर्म जो जगके माहीं । मनहीं केर पसारा आहीं ॥ मन माया तिरगुन न्यौहारा । जक्तमाह भ्रम जाल पसारा ॥
अथ योग और भोग दोनों मिथ्या वर्णन
दोहा—षट्दल चक्रको भेदके, योगी पौन चढ़ाय । दल सहस्रके कमलमें, निर्विकल्प हो जाय ॥ हो विदेह पद अमर लह, विद्यामें ठहराय । भे निरद्वन्द्व न कल्पना, आपमें आप समाय ॥
चौपाई
जिमि योगी तिमि भोगी देखे । कमल भेद दोनों यक लेखे ॥ द्वन्द्वदीब दोनोंको खेला । इत नरनारी उत गुर चेला ॥ योगी उरध पौन चढ़ावै । भोगी अधषानी ले आवै ॥ नादके बल योगी अविनाशी । विंदके चल भोगी सुखराशी ॥ नारिपुरुष जब भा संयोगा । दोनों मिले भोग सुख भोगा ॥ माथेसे जब माथ जुरेऊ । सिरवर कमलते बिंद उतरेऊ ॥
( १९९२ )
बोधसागर
८४
नेत्रसे नेत्र जुटे जिहि बारा । द्वैदल कमल भेदि चलु पारा ॥ मुखसे मुख जेहि औसर चूमा । तबही बिंद अधो दिस घूमा ॥ तब घोडश दल कमल बधाना । द्वादशदलपर पुनि ठहराना ॥ अनहद चक्रते बिंद उतारा । मणिपूरकपर आसन धारा ॥ मणिपूरकते हेटको हेरा । स्वाधिष्ठान चक्र कर डेरा ॥ नारिपुरुष मिलि द्वन्द मचाया । स्वाधिष्ठान उतरि जल आया ॥ टिका अधारचक्र जब पानी । सह विकल्प भोगी तब जाना ॥ ज्ञान पुत्र योगा जब पायौ । अमर भयौ फिर गर्भ न आयौ ॥ योगी हृदये जबलों ज्ञाना । तबलों ताको अमर बखाना ॥ ज्ञान लोप होवे जेहि काला । तब योगीको हो जंजाला ॥ ज्ञानदृष्टि करि योगी जाना । मेंहंमि जगमें पसराना ॥ अज्ञ पुत्र तिमि योगी जाया । वंशवृद्धि जगमें फैलाया ॥ भोगी अमर भयौ तेहि बारा । तासु वंश जगमाह पसारा ॥ जबलों वंश जक्तमें ताका । भोगा अमर भयौ परिपाका ॥ तासु वंश जब हो संसारा । भोगी मृतक होय तेहि बारा ॥ आपै आप सकल जगमाही । अज्ञदृष्टि करि जा तन नाहीं ॥ योगी विद्या द्वारे जाना । भोगी अविद्याते अज्ञाना ॥ योग भोग दोनों हैं झूठे । संत सुजान दोहूते हूठे ॥ योगअरु भोग ब्रह्म जिव माया । नादर्शिद जो कछु उपजाया ॥ सो सब भर्म एक नहिं सांचा । सांचे सतगुरुको यह वाचा ॥ भर्मै नाद अरु भर्मै बिंदू । भर्महि तुर्क अरु भर्मै हिंदू ॥ भर्म निमाज भर्मही रोजा । भर्महि ते सब ईश्वर खोजा ॥ भर्महि देऊल भर्महि देवा । भर्महि पूजा भर्महि सेवा ॥ भर्महि धरती भर्म अकाशा । भर्महिको यह सकल प्रकाशा ॥ भर्मको रचित सकल संसारा । टूटै भर्म होय भव पारा ॥
इति योग और भोग मिथ्या
८५
जीवधमबाध
( १९९२ )
अथ स्वसंवेदमते अष्टांगयोगवर्णन सत्यकबीरवचन अष्टांगयोगकी रमैनी अविगति लीला अगम अपारा । धरती धरचौ सत्य औतारा ॥ अविगति लीला अगम अलेखा । अवरन बरन रूप नहिरेखा ॥ जाकी गति सुर मुनि नहीं पाई । अविगतिकीगतिवरनि न जाई ॥ शेष सहस्रमुख निशिदिन गावे । अस्तुति करति पार नहीं पावे ॥ वेद जो कोट सहस्र पुन गावे । अविगति गतिवरनी नहीं जावे ॥
साखी-अविगतिकी बेगति है, मन बुध चितते दूर ।
आपमेटि सतगुरु मिलै, पावै दरस हजूर ॥
रमैनी
योगी बहुत योग जो करई । कृपा योगते नहीं निस्तरई ॥ फिर फिर आवै फिर-फिर जाई । कर्महि कर्म बहुत अरु झाई ॥ है निष्कर्म नाम जो ध्यावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ कमही कम बंधावहु भारा । कमही कम अटका संसारा ॥ देह कर्म जो लीन उठाई । मनको कर्म छुटै नहीं भाई ॥ जब लगिमनकी कर्म न खोवै । तबलगि मननिर्मल नहीं होवै ॥ जब मनकी किरिया मिटि जाई । तब हरि मिलै सहजमे आई ॥
साखी-तन किरियाको छोड़िके, मन किरिया रुचिराख ॥
कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निजु भाष ॥
रमैनी
तनकी करनी देहु बहाई । मनकी करनी सत्य मिलाई ॥ मनकी किरिया सत्य जो कोई । ताहि समान और नहीं कोई ॥ सांख्य योग करनी है सारा । जेहिते उतरे भव जल पारा ॥ सत्य क्रियाते ज्ञानी भैऊ । सत्यक्रिया साहिब मिलगैऊ ॥ सत्य क्रिया सतपुरुष हि ध्यावै । सत्कक्रिया सतनाम मिलावै ॥
साखी-सत्यक्रिया निर्वान है, तन मन ते सो भिन्न ।
मन पौना टढकै गहै, सत्यनाम निजु चिन्ह ॥
नं. ११ बोधसागर - ८
( १९९४ )
बोधसागर
८६
चौपाई
अब मैं सांख्ययोग जो कहऊँ । योग अष्टांगको लक्षण लहऊ ॥ एकएकके चार चार लक्षण । जो जानै सो होय विचक्षण ॥ येतो कहिये लक्षण बतीसा । योग अष्टांगमें एकै दीसा ॥ अष्टांग योग सांख्य जो जाने । अरु लक्षण बत्तिस पहिचाने ॥
समौ-तेई भवसागर तरे, याकरनी निजु सार ।
सत्यकिया सतसे गहै, सत्यनाम आधार ॥
रमैनी
प्रथमै योग ज्ञान है भाई । ताहिते सुखव परमपद पाई ॥ निरालंब आलंब न कोई । सतगुरु इच्छा होय सो होई ॥ कर्म भरम तजि साहेब जाने । भली बुरी कछु चित्त नहि आने ॥ निरवासनिक वास नहि कोई । जंगल वस्ती एक सो होई ॥ है निरवैर रहै ततसारा । बाहर भीतर अलख अपारा ॥
समौ-एकनामको जानिके, दूजा देय बहाय ।
तीरथ व्रत जप तप नहिं, आतम ताव समाय ॥
रमैनी
दूजा योग विचार विचारे । निरमोही है आप विचारे ॥ है निवैँ रहै जगमाहीं । जगके सुखमें लगै नाहीं ॥ मातु पिता सुत नारि न भावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥ है निष्कंट शब्दसे लागे । अनहद सुने आतमा जागे ॥ देही छोड़ि विदेह समाना । हंसा पावै पद निर्बाना ॥
समौ-जो कछु करे विचारके, रह पुन्यपापते न्यार ।
कहै कबीर नामहि जाने, जाय पुरुष दरवार ॥
रमैनी
तीजे योग विवेक कहावै । बिन विवेक कोइ पार न पावै ॥
८७
जीवधर्मबोध
(१९९५)
जाको समाधान मन होई। भली बुरी कहि जावै कोई ॥ समदरशी समज्ञान विचारे। सबघट भीतर ब्रह्म निहारे ॥ प्रीति गहे सो नाम समाना। और सकल जग मिथ्या जाना ॥ जाके शांति होइ घट नाही। कोइ कछु कहै कोध मन नाही ॥
रमैनी
चौथा योग शील कहि दीना। विना शील साहेब नहिं चीन्हा ॥ निर्मल सोचे सोचि विचारे। शुचि रुचि दया धर्म उर धारे ॥ मनको संयम करै जो ज्ञानी। पांचों पकरि एक घर आनी ॥ सत्य शब्द भावै संसारा। सत्यहिसे उतरे भवपारा ॥ होय औतारा सत्य बखाने। भावै बुरा भला कोइ माने ॥
समौ-शीलक्षमा जब ऊपजै, अलख दृष्टि जब होय।
विना शील पहुँचे नहीं, लाखो कथै जो कोय ॥
रमैनी
पच्वां योग सन्तोष बखानी। बिन संतोष बुझे अज्ञानी ॥ मानै नहीं रंक औ राजा। है अमान नहिं काहुते काजा ॥ नर्क स्वर्ग बाँछै नहिं कोई। होय अबच्छक साहेब सोई ॥ मन अस्थिर करि प्रेम उपजावै। अनहद शब्द सुने चितलावै ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाशकर, रह सुखसेज समय।
सत्य नाम सन्तोष बिन, सत्यलोक नहिं जाय ॥
रमैनी
छठै योग रहै निरवैरा। जाते जगते होय न वैरा ॥ सब घट भीतर एक करि जानी। होय सुदृष्टि परम परमानी ॥ सुख दाई सबहिनको भावै। जलस्वरूप है अग्नि बुझावै ॥ शीतल है सबहीको भावै। समता हो रमताको पावै ॥
समौ-कंचन काँचि है एकसम, दुष्ट मित्र सम एक।
दूजा भाव न जानहीं, एक नामकी टेक ॥
( १९९६ )
बोधसागर
८८
रमैनी
सतवां योग सहज है मीता । सहज भावसे यम से जीता ॥ एक विचार प्रेम उपजावै । पांचों इन्द्री सहज समावै ॥ निरलोभी है लोभ भुलावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥ निस्संशीक होय जो कोई । संशय काल रहै नहिं कोई ॥ है निलैप कतहु नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागे ॥
समौ-सब जग जूठा जानिके, सत्य नाम है सार ॥ सहजे सहज प्रकट भया, सतगुरु शब्द सँभार ॥
रमैनी
अठयौ योग शून्य है नीका । एकनाम आगे जग लागे फीका ॥ श्रुत्रहीते सब जग उपराजा । श्रुत्रहीते शब्द जो बाजा ॥ सहज श्रुत्र जो लावै कोई । अलखको लखै आपही सोई ॥ सहज शून्य जो ध्यान लगावै । भवजल तरत वार नहिं लावै ॥ सुरति शब्द ले सहज समावै । सहज समाधि परमपद पावै ॥
समौ-ज्ञानविचार विवेकते, शील संतोष समाय । नाम गहों निर्भय रहो, सत्यलोक सहजे जाय ॥
इति अष्टांग योगकी रमैनी
अथ ज्ञानपरीक्षा चार
निरालंब । निर्भर्म । निर्वासनिक । निरस्वादी ॥ १ ॥
विचारपरीक्षा चार
निरमोही । निरबंध । निःशंक । निर्वान ॥ २ ॥
विवेकपरीक्षा चार
सर्वगी । सावधान । सुचेत । सारग्राही ॥ ३ ॥
शीलपरीक्षा चार
शुची । संयमी । श्रोता । वक्ता ॥ ४ ॥
८९
जीवधर्मबोध
( १९९७ )
संतोषपरीक्षा चार
अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥
निर्वैरपरीक्षा चार
सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥
सहजपरीक्षा चार
निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥
शून्यपरीक्षा चार
लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥
समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।
कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥
इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै
अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।
बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥
चौपाई
प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥ ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥ द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥ तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥ चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥ हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥ पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥ छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥ ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥ सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥
( १९९८ )
बोधसागर
९०
ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥
इति ज्ञानभूमिका
अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।
जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥
चौपाई
प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥ दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥ तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥ ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥ चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥ पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥ छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥ सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥ सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥ यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥ प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥ सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥ सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥ दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥ सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥ जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥ दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥ हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥ जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥
९१
जीवधमबाध
( १९९९ )
जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥ भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥ जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥ सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥ छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥ विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥ दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥ ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥
इति
अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥ सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥ व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥ सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥ सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥ साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥ इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥ जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥ प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥ आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥
सत्यकवीर वचन-शब्द
भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान । भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥ भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।