कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १९९२ )
बोधसागर
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नेत्रसे नेत्र जुटे जिहि बारा । द्वैदल कमल भेदि चलु पारा ॥ मुखसे मुख जेहि औसर चूमा । तबही बिंद अधो दिस घूमा ॥ तब घोडश दल कमल बधाना । द्वादशदलपर पुनि ठहराना ॥ अनहद चक्रते बिंद उतारा । मणिपूरकपर आसन धारा ॥ मणिपूरकते हेटको हेरा । स्वाधिष्ठान चक्र कर डेरा ॥ नारिपुरुष मिलि द्वन्द मचाया । स्वाधिष्ठान उतरि जल आया ॥ टिका अधारचक्र जब पानी । सह विकल्प भोगी तब जाना ॥ ज्ञान पुत्र योगा जब पायौ । अमर भयौ फिर गर्भ न आयौ ॥ योगी हृदये जबलों ज्ञाना । तबलों ताको अमर बखाना ॥ ज्ञान लोप होवे जेहि काला । तब योगीको हो जंजाला ॥ ज्ञानदृष्टि करि योगी जाना । मेंहंमि जगमें पसराना ॥ अज्ञ पुत्र तिमि योगी जाया । वंशवृद्धि जगमें फैलाया ॥ भोगी अमर भयौ तेहि बारा । तासु वंश जगमाह पसारा ॥ जबलों वंश जक्तमें ताका । भोगा अमर भयौ परिपाका ॥ तासु वंश जब हो संसारा । भोगी मृतक होय तेहि बारा ॥ आपै आप सकल जगमाही । अज्ञदृष्टि करि जा तन नाहीं ॥ योगी विद्या द्वारे जाना । भोगी अविद्याते अज्ञाना ॥ योग भोग दोनों हैं झूठे । संत सुजान दोहूते हूठे ॥ योगअरु भोग ब्रह्म जिव माया । नादर्शिद जो कछु उपजाया ॥ सो सब भर्म एक नहिं सांचा । सांचे सतगुरुको यह वाचा ॥ भर्मै नाद अरु भर्मै बिंदू । भर्महि तुर्क अरु भर्मै हिंदू ॥ भर्म निमाज भर्मही रोजा । भर्महि ते सब ईश्वर खोजा ॥ भर्महि देऊल भर्महि देवा । भर्महि पूजा भर्महि सेवा ॥ भर्महि धरती भर्म अकाशा । भर्महिको यह सकल प्रकाशा ॥ भर्मको रचित सकल संसारा । टूटै भर्म होय भव पारा ॥
इति योग और भोग मिथ्या