भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधमबाध

( १९९२ )

अथ स्वसंवेदमते अष्टांगयोगवर्णन सत्यकबीरवचन अष्टांगयोगकी रमैनी अविगति लीला अगम अपारा । धरती धरचौ सत्य औतारा ॥ अविगति लीला अगम अलेखा । अवरन बरन रूप नहिरेखा ॥ जाकी गति सुर मुनि नहीं पाई । अविगतिकीगतिवरनि न जाई ॥ शेष सहस्रमुख निशिदिन गावे । अस्तुति करति पार नहीं पावे ॥ वेद जो कोट सहस्र पुन गावे । अविगति गतिवरनी नहीं जावे ॥

साखी-अविगतिकी बेगति है, मन बुध चितते दूर ।

आपमेटि सतगुरु मिलै, पावै दरस हजूर ॥

रमैनी

योगी बहुत योग जो करई । कृपा योगते नहीं निस्तरई ॥ फिर फिर आवै फिर-फिर जाई । कर्महि कर्म बहुत अरु झाई ॥ है निष्कर्म नाम जो ध्यावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ कमही कम बंधावहु भारा । कमही कम अटका संसारा ॥ देह कर्म जो लीन उठाई । मनको कर्म छुटै नहीं भाई ॥ जब लगिमनकी कर्म न खोवै । तबलगि मननिर्मल नहीं होवै ॥ जब मनकी किरिया मिटि जाई । तब हरि मिलै सहजमे आई ॥

साखी-तन किरियाको छोड़िके, मन किरिया रुचिराख ॥

कर्म क्रिया अभिमान तजि, सत्यनाम निजु भाष ॥

रमैनी

तनकी करनी देहु बहाई । मनकी करनी सत्य मिलाई ॥ मनकी किरिया सत्य जो कोई । ताहि समान और नहीं कोई ॥ सांख्य योग करनी है सारा । जेहिते उतरे भव जल पारा ॥ सत्य क्रियाते ज्ञानी भैऊ । सत्यक्रिया साहिब मिलगैऊ ॥ सत्य क्रिया सतपुरुष हि ध्यावै । सत्कक्रिया सतनाम मिलावै ॥

साखी-सत्यक्रिया निर्वान है, तन मन ते सो भिन्न ।

मन पौना टढकै गहै, सत्यनाम निजु चिन्ह ॥

नं. ११ बोधसागर - ८