कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८९
जीवधर्मबोध
( १९९७ )
संतोषपरीक्षा चार
अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥
निर्वैरपरीक्षा चार
सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥
सहजपरीक्षा चार
निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥
शून्यपरीक्षा चार
लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥
समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।
कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥
इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै
अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन
दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।
बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥
चौपाई
प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥ ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥ द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥ तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥ चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥ हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥ पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥ छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥ ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥ सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥