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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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८९

जीवधर्मबोध

( १९९७ )

संतोषपरीक्षा चार

अयाची । अवांछी । अमानी । अस्थिर ॥ ५ ॥

निर्वैरपरीक्षा चार

सुहृद । समता । शीतल । सुखदाई ॥ ६ ॥

सहजपरीक्षा चार

निष्प्रपंच । निस्तुरंग । निर्द्रढ़ । निलैष ॥ ७ ॥

शून्यपरीक्षा चार

लौलक्ष । धीरज । ध्यान । समाधि ॥ ८ ॥

समौ-कबीर बतीसो जब उगवै, तैतीसो छपि जाय ।

कहै कबीर सुन गोरख, आवागमन नसाय ॥

इति अष्टांगयोग स्वसंवेदमतै

अथ सातज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-सीषता विचार समानता, सिसरातो सुखपंत ।

बहुरि पदार्थ अभावनी, तुरिया ज्ञान गहंत ॥

चौपाई

प्रथम सीषता भूमि जो कहिये । शुभइच्छाते शुभ गति लहिये ॥ ज्ञानचाह सच्छास्त्र उचारन । सत्संगत अपकर्म निवारन ॥ द्वितीय विचार भूमिका सोई । दूँढ सुसंग सुविद्या जोई ॥ तृतीय समाता है वैरागा । तन मनते विषयनको त्यागा ॥ चौथे भूमि सिस्तांत कहावै । गेह नेह तजि अलग रहावै ॥ हो निवृत्त सब विषय बिहाई । हरिपद प्रीति न और सोहाई ॥ पंचई भूमि सुषुप्ति कहीजै । ईश्वरलीन भर्म भय छीजै ॥ छठे पदारथ अभावनी भाषा । प्रभुपद लीन न सुचितन राखा ॥ ऐसो ध्यान नाह अनुरागा । बिना जमाये सो नहि जागा ॥ सतई भूमि कहावै तुरिया । जहां पहुंचपुनिचितनहिफुरिया ॥

( १९९८ )

बोधसागर

९०

ऐसो ईश्वरमें लौं लागे । कोऊ जगावै तऊ न जागे ॥

इति ज्ञानभूमिका

अथ सात अज्ञानभूमिकावर्णन

दोहा-अशुची है जागृतो, महा जागृती गत ।

जागृत स्वप्ना स्वप्न, जागृत पुनि स्वप्ना सुषुप्त ॥

चौपाई

प्रथम अशुचि जागत अज्ञाना । तन सुख चाह सदा अलसाना ॥ दुतिये जागृत जाहि बखाना । अहं कुलीन श्रेष्ठ गुनज्ञाना ॥ तृतिये महाजागत यौं भाषे । दोहू लोक पौरुष हम राखे ॥ ऐसो मैं गुणज्ञान निधाना । मेरे वशमें अहै फलाना ॥ चौथे जागृत स्वप्ना यांचा । जो मैं कहों सुनो सब सांचा ॥ पंचम स्वप्ना जागत भाषा । देखे स्वप्न सुरति सब राखा ॥ छठयें स्वप्न भूमिका कहई । देखे स्वप्न सुरति नहिं रहई ॥ सप्तम भूमि सुषोपति होई । सुधिवुधिरहित जीव जब सोई ॥ सातो भूमि ज्ञान उर धारो । पुनि सातो अज्ञान विचारो ॥ यक पौरीपर दूजी पौरी । होय सघनता अगिली ठौरी ॥ प्रभुमें शुभ इच्छा जब होई । सच्छास्त्रन अवलोकै सोई ॥ सच्छास्त्रनको रस भल चीखी । ताकी बुद्धि भई तब तीखी ॥ सच्छास्त्रन पठि भयौ जो पक्का । तब तो दुतिय मूगिका तक्का ॥ दुतिय भूमिका आहि विचारा । तब सत्संगतको पग धारा ॥ सत्संगत जब जीव टटोले । तब ग्रन्थनकी ग्रन्थी खोले ॥ जबलों नहिं सत्संगत जूटे । ग्रन्थनकी ग्रन्थी नहिं छूटे ॥ दुतिय भूमिमें जब जिव पागा । तब तृतियेमें हो वैरागा ॥ हठ बैराग होय जिहि काला । चौथ भूमिकामें पग डाला ॥ जब चौथीमें हठ जिव भैऊ । तब पंचम हरिपद गहिलैऊ ॥

९१

जीवधमबाध

( १९९९ )

जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥ भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥ जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥ सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥ छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥ विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥ दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥ ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥

इति

अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥ सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥ व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥ सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥ सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥ साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥ इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥ जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥ प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥ आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥

सत्यकवीर वचन-शब्द

भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान । भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥ भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।

( २००० )

बोधसागर

९२

भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥ कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव । औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥ जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय । कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥

चौपाई

लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥ कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥ मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥ सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥ जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥ झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥ उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥ गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥ कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥ हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥ शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥ हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥ ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥ कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥ सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥ आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥ कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥ भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥

९३

जीवधर्मबोध

(२००१)

वेद कि बिधिते जो कोइ ध्यावै । जीवन्मुक्तकी पदवी पावै ॥ स्वसंवेद विधि कर्म जो करिये । पाय अमरपद बहुरी न मरिये ॥

सत्यकबीर वचन-शब्दहेली

हेली तीरथ जाय बलाय । हरदम परवी नहाय ॥ तीरथ कोट अनंत है रे गंग यमुन जहैं दोय । मध्य सरस्वती वहत है नहाये निरमल होय ॥ ब्रह्म नयके घाटमें हो आगे शिवको लिंग । ताहुँपै दक्षिना दीजिये रे बहे सहसमुख गंग ॥ आगे कलाली कि हाट है रे चोखा फूल चुबंत ॥ बिन सतगुरु पावै नहीं कोई साधूजन पीवंत ॥ शीश उतारि धरनि धरैरे ऊपर धरि ले पाय । ब्रह्म नयके घाट मेरे याविधि परवी नहाय ॥ ऋग यजुर साम अथर्वना रे चार वेदको ज्ञान । उनकी कहो उहो कौनगति बांधे गांठि पखान ॥ चारवेदको पिता है रे स्वसंवेद संगीत । साहिब कबीर जूके मोकदिमे रे अविगति ब्रह्म अतीत ॥

इति जीवनमुक्तमिथ्या

अथ वर्णाश्रममिथ्यावर्णन-चौपाई

वर्णाश्रम सब मिथ्या जाना । नरकृत सो अज्ञानते माना ॥ पूर्व कर्म बिन यहि तनमाहीं । केते विप्र शुद्ध हैं जाहीं ॥ केते शुद्ध विप्र सो भैऊ । मातु पिता नहीं ब्राह्मण रहेऊ ॥ जो कोई वर्णाश्रमते अटका । निश्चय सो सत्पन्थसे भटका ॥ मल अरु मूत्र कि देही जोई । ताको ब्राह्मण कहे न कोई ॥ ज्ञान द्वार जो ब्राह्मण भैऊ । वर्णाश्रम ताके नहीं रहेऊ ॥

( २००२ )

बोधसागर

९४

राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥ जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥ उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥ लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥ प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥ भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥ चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥ प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥ जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥ दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥ जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥ ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥ ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥ अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥ सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥ येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥ जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥ वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥ भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥ केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥ नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥ कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥ ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥ तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥ तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥

९५

जीवधर्मबोध

( २००३ )

उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥ ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥ कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥ यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥ असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥ जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥ जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥ तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥ पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥ कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥ जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥ पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥ सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥ हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥ जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥ विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥ गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥ पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥ कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥ दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥ रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥ कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥ ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥ वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥ नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥

( २००४ )

बोधसागर

९६

उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥ सत्यकबीर वचन

साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय । नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय । बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार । सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥

रमैनी

पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥

शब्द

नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥ पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥ गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥ पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥ जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥ जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥ कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥

चौपाई

वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥ कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥ तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥ गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥ दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥ प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥ काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥ पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥

९७

जीवधर्मबोध

( २००५ )

सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥ जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥ षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥ जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥ शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥ एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥ सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥ नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥ केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥

इति वर्णार्थम मिथ्या

अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई

अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥ हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥ कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥ जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥ वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥ नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥ के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥ निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥ बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥ पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥ गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥ यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥ अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥

( २००६ )

बोधसागर

९८

सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥ करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥

इति

अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई

सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥ स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥ वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥ ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥ स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥ यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥ ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥

दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।

ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥

चौपाई

षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥ सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥ स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥ स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥ पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥ अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥ पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥ यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥ पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥ इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥ शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥

११

जीवधर्मबोध

( २००७ )

भिन्न भिन्न पूजा परकाशा । सकल जीव गल डारे फांसा ॥ रजगुण ब्रह्मा है संसारी । कर्मजाल जिन जक्त पसारी ॥ तमगुण रूप महादेव केरा । भवसागरमें ताको डेरा ॥ सतगुन मारग जो कोड धरई । भवसागरके पार उतरई ॥ द्रन्द खेल सतगुणमें बतें । ताहु भिन्नभाव बहु करते ॥ प्रथमहि विष्णु संप्रदा चारी । दुतिये सत्यपंथ आचारी ॥ वेद कि विधि पूरणता पावै । स्वसंवेद कह तब समुहावै ॥ जीवहि अवश्य कर्म सो करनो । सतगुणकी मारग पग धरनो ॥ सात प्रकार कहों पुनि धर्मा । भिन्न-भिन्न तिनको सुन भर्मा ॥ शक्ति निरंजन त्रिगुन है पांचो । वेद विदित शुभ धर्म है सांचो ॥ छठा धर्म कहिये शैतानी । जिनको गुरु इबलीस बखानी ॥ सप्तम धर्म कबीर कृपाला । जरतजक्त जिव जिन प्रतिपाला ॥ प्रथमें ब्रह्मा रजगुण कहिये । कर्मकांड सब ताते गहिये ॥ दुतिमें विष्णु उपासना हेता । तृतिये शंभु योग चित चेता ॥ चौथे ज्ञान निरञ्जन राया । पंचम शक्ति पसान्यौ माया ॥ तीन तीन विधि तिनमें आही । उत्तम मध्यम कनिष्ठ कहाही ॥ छठे धर्म इबलीसको जाई । तीन विभाग ताहुमें होई ॥ ॥ उत्तम कर्म करंता जोई । बुधि विद्या सागर है सोई ॥ कोड गुणगण कोड धनमद पूरे । कोड बाह विजयी है शूरे ॥ जो मद मान सहित हंकारा । मैं बड़ डोरहि तुच्छ विचारा ॥ मोरे योग गुरु कहूँ नाहीं । सो शैतानको पन्थ गहाहीं ॥ उत्तम कर्म जो करे करावै । मलिन कर्म लख दूर परावै ॥ ऐसे सुकर्म करे जो लोगा । ताते नर्क भोग नहि भोगा ॥ तिनको आवागौन न छूटे । योनी संकट पुनि पुनि जूटे ॥ दुतिये आपन उत्तम करनी । और सिखाये सुख कह बरनी ॥

( २००८ )

बोधसागर

१००

तृतिये करे करावै पापू । घोर नर्क अह तिनका थापू ॥

दोहा-विविधि कह इबलीस जन, उत्तम मध्यम नीच ।

जस मति तस गति प्रेरिके, ल्यावै तिनको खींच ॥

चौपाई

कोई रजोगुण कर्म कहीजै । कोई मलीन रजोगुण भीजै ॥

कोई सतोगुण धर्म प्रचारा । कोई मलीन सतोगुण धारा ॥

कोई तमोगुण ऐसे जानो । विविधि भेद तिनमाह प्रमानो ॥

पञ्चधर्म षट्धर्म बखाना । इहाँलो विषय वासना नाना ॥

यह षट्धर्म जत्तमें जागे । सकल नारि नर तिनमें लागे ॥

छवो त्याग सप्तम जब चीन्हा । सत्य पन्थपर तब पग दीन्हा ॥

देव कबीर धर्म नयसागर । तापद गहि बीते सब झागर ॥

विषय विकारकी भै तब हानी । सरिता सकल सिंधु ससुहानी ॥

निश्चल होहि पाय प्रिय अपना । जहँ नहिं अमभय केर कल्पना ॥

मन बानीते पार जो होई । ताकी कथा कहे किमि कोई ॥

मीन विहंग कि मारग दूँढ़ा । बुद्धिविहीन विचारन सूढ़ा ॥

पठि गुण तोता कहे कहानी । बिना विचार मूलकी हानी ॥

झूठना

मूल जाने बिना धूल रसरीवरे मीन पग पंथ कहु कौन पावै ॥

दूर नेरे नहीं क्रूर हेरे तही बिना गुरु गम्य तेहि को लखावै ॥

जासुको नाम नहीं रूप नहिं रेख है भेष आलेख कह देख कोई ॥

बकत बहु वाय है सार नहिं पाय है घोषको धर्म गहि भर्म भोई ॥

स्वप्नकी वस्तु जौँ दूँढ़ जागृतमें हाथ आवै नहीं यत्न कीने ।

चारहु दशाते पार सरकार जो तासु दरबार पथ कौन लीने ॥

खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी योग अरु युक्ति सब रहै पोले ॥

दुन्मुनी खातजहँ उन्मुनीफिरत है अलककीझलकको पलकखोले ॥

१०१

जीवधर्मपौध

( २००९ )

भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै । यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥

इति श्रीधर्मव्यौरा

अथ वेदधर्म व्यौरा

दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव । सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥

चौपाई

सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥ चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥ भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥ कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥ नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥ गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥ धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥ गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥ वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥ ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥ पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥ व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥ केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥ पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥ झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥ झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥

इति वेदधर्म

( २०१० )

बोधसागर

१०२

अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥ शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥ रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥ अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥ देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥ दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥ प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥ महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥ जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥ जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥ दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥ दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥ दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥ दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥ तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥ जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥ फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥ पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥ तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥ घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥ ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥ बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥ दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥ जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥

१०३

जीवधर्मबोध

(२०११)

चौथा काल जैनी जो कहेऊ । वज्रशरीर मनुष को रहेऊ ॥ जैनी करहि तबहि तप भारी । करि करनी सुख धाम सिधारी ॥ अब यह काल होयसो नाही । ज्ञान सुक्ति नहिं तिनके पाहीं ॥ परमारथ न होय बिनदाना । गहे साधु परमारथ बाना ॥ जहँ परमारथ दान कि हानी । तहां सुगति पावै कह प्रानी ॥ जैनमते अब सुक्ति न पाई । अन्य धर्म जिवको सुखदाई ॥ पंचम काल जैनको येहा । ज्ञानी सन्त धरे बहु देहा ॥ और धर्ममें जैनमें नाही । जो परमारथ दान कराही ॥ धर्मके चार चरण बतलाया । सत अरु सौच दान अरु दाया ॥ कलिमें कहा सप्त पदवर्ता । नाम दान कलिमल संहर्ता ॥ जैनमें सप्त शौच अरु दाना । तीनों चरण विभंग बखाना ॥ महाकठिनतप करि जब ध्यावत । चौथकाल कोई गति पावत ॥ अब यहि कालसो व्रतको पाले । एक टांगते धर्म न चाले ॥ संबंधी तन मन धन तीनों । यह प्रमान सब धर्महि कीनों ॥ तन मन धन बिन कार्य न कोई । स्वारथ अरु परमारथ दोई ॥ तन मन दे जब कर सेवकाई । तब धन लाभ होय दुनियाई ॥ धनको त्यागि औरको दीजै । तन मन ताते लाभ लहीजै ॥ तन मन धन दे जिहि जिन साधा । कोई दुनिया कोई हरि अवराधा ॥ तिहुदे सोइ अवश्य लहीजै । जब काहू दिश निज दिल दीजै ॥ तिहु बिन कर्म जो साधा चहई । सो शठ हठ अज्ञानी अहई ॥ तजि धन साधु जो वनमें बसही । घोर घोर तप करि तन कसही ॥ धनको दान दंड तिहि नाही । रहे नहीं धन जिनके पाहीं ॥ दारिद्री अरु भिक्षुक जोई । ताते दान लेत नहिं कोई ॥ जिहि औसर नर वज्र शरीरा । सहे परीसा लहै न पीरा ॥ दुःख अनंत देहीपर परही । जप तप साधु गृही दोउ करही ॥

( २०१२ )

बीधसागर

१०४

महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥ पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥ दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥ धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥ ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥ तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥ जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥ एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥ एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥ राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥ ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥ यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥ क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥ जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥ यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥ यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥ ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥ अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥ वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥ एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥ ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥ सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥ मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥ और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥ इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥

१०५

जीवधर्मबोध

( २०१३ )

अग्नि पौन आदिक जो कहाऊ । इन्द्रके दरवारिनको नाऊ ॥ इन्द्रहि रणमें रावन जीता । बंधन डारिके देतेहि कीता ॥ नृपको जब बंधनमें डारा । मन्त्रिनको कर चेरवा डारा ॥ नीचटहल दरबारिन गहेऊ । अग्नि पौन रावन बस भैऊ ॥ अग्नि पौन आदिक जो कहेऊ । सो सब नाम मनुषको रहेऊ ॥ सुरपति नहीं बंधनमें आवै । मिथ्याती सब कूट बतावै ॥ छनमें इन्द्र प्रलय जग करई । ताहि कौन बंधनमें धरई ॥ प्रलय करे फिर जग प्रकटावै । सो किमि रावनकी बस आवै ॥ ऐसो अग्नि पौन बलकारा । छनमें प्रलय करे संसारा ॥ मिथ्याती सब कूठ वर्णके । अग्नि पौन रह बस रावनके ॥ ब्रह्मन क्षत्री होय लराई । क्षत्री द्विजनको मारि हटाई ॥ परशुराम तब द्विजकुल होई । परमशत्रु क्षत्रीको सोई ॥ ताते अनगिन क्षत्री मारा । तब सुभूमि लीवो औतारा ॥ क्षत्री चक्रवर्त पदधारा । पशुरामको ताने मारा ॥ हनिवर द्वीपकौ राजा जोई । हनोमानको नाना सोई ॥ हनोमान ननिओ रे गैऊ । आदर मान तहां बड़ भैऊ ॥ हनिवर द्वीपमें आदर पाई । ताते हनोमान कहलाई ॥ बानरवंशी क्षत्री सोई । हनोमान विद्याधर होई ॥ रूप अनूप महा छबि जाको । कामदेव औतार है ताको ॥ बज्र अंग बल बरनि न जाई । गुणगणशील जासो अधिकार्ई ॥ राजा पौन जय कहलाये । हनुमान है ताके जाये ॥ पौनते मनुष न जन्मै कोई । यह कपोलकलपित सब होई ॥ हनोमानको बानर भाषा । पीठके ऊपर पूछ सो राखा ॥ कूठ कथा मिथ्याती कहई । नर बानर किमि संगत गहई ॥ बालि सुकंठ आदि नृप जेते । बानरवंशके क्षत्री तेते ॥

( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥ चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥ ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥ कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥ देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥ जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥ अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥ यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥ ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय । परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥ सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥ ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥ नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥ निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥ कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥ जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥ स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥ सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥ इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥

१०७

जीवधर्मबोध

( २०१५ )

मान सरोवर हंस निवासा । बकुला तहां करहि नहिं वासा ॥ भोजन भैक मीन जिन केरा । तिनको डाबर माह बसेरा ॥ जो हरिनाम खुगे शुचि मोती । बसे मानसर तिनके गोती ॥ सब जीवनके जो हितकारी । परमारथमें तन धन वारी ॥ स्वसंवेदकी आस गहाई । अन्य नती बहु रीति चलाई ॥ निर्मल जल अकाशते आवै । भूमि परत डाबर है जावै ॥ तिमि सब स्वसंवेदते वानी । भिन्न भाव धरिजग प्रकटानी ॥ सत्यपंथके गृही विरागी । परम पुरुषकी सेवा लागी ॥ जुरे समाज जहांयक तीरा । ढोल मृदंग मधुर मखीरा ॥ बजै झांझ खँजरी करताला । बाजन विविधि प्रकार सुताला ॥ सत्य कबीरको नाद उठावै । रहसि-रहसि प्रभुको गुण गावै ॥ सन्त गुरुकी सेवा माहीं । इन्है समान और कोउ नाहीं ॥ परमधर्म गुरुसन्तकी सेवा । ताते मिले पुरातन देवा ॥ धरे जेते धन द्रव्य शुभागे । सब गुरु सन्त सेवमें लागे ॥ गृही होय गुरु साधू सेवै । वैरागी तपमें चित देवै ॥ परम उदार चित जिन केरा । सत्यलोकमें तासु बसेरा ॥

इति स्वसंवेद

अथ स्मार्तमत व्यौरा वर्णन

दोहा—सतगुण रजगुण धर्ममय, स्मृती मत संन्यास ।

उत्तम मध्य कनिष्ठ विधि, कौजै कथा प्रकाश ॥

चौपाई

उत्तम मध्यम जो संन्यासा । सतगुण मयी ताही परकाशा ॥ दीगम्बर दंडी संन्यासी । दोनों धर्म सतो गुण राशी ॥ अब कनिष्ठ संन्यास कहीजै । जब सत रज मिश्रित चित दीजै ॥ कोइ कोइ दुराचार इन माही । मद्य मांसको भोग कराही ॥

( २०१६ )

बोधसागर

१०८

योगी अरु संन्यासी दोई । एक स्वरूप जानिये सोई ॥ इति स्मार्तभत

अथ मीमांसाधर्म वर्णन—चौपाई

रजगुण ब्रह्मा रूप कहावै । धर्म मिमांसा जक्त चलावै ॥ कर्मते श्रेष्ठ और नहिं कोई । कर्महिंते सब रचना होई ॥

इति मीमांसा

अथ मूसा और ईसाधर्म व्यौरा—चौपाई

रजगुण तमगुण जहां मिलाई । मूसाधर्म और ईसाई ॥ होम यज्ञ तौरेत बखाना । यथा वेदविधि कीन प्रमाना ॥ सागपात जैसे तरकारी । तैसे नर मद मांसु अहारी ॥ मानुष घातसे पातक माना । इतर जीव सब साग समाना ॥ मूसा धर्म यहूदी धारा । यहि मतको नहिं अधिक पसारा ॥ मूसाके कोइ शिष्य न रहेऊ । ताते धर्म कि बृद्धि न भयऊ ॥ अबीरामको जो सन्ताना । मूसाधर्म करे परमाना ॥ सतगुणरूप आहि ईसाई । क्षमा शीलतामें अधिकाई ॥ छल बल रहित दीनता धरही । उज्ज्वल किया शौच आचरही ॥ मद्य मांसको करे अहारा । ताते तमगुणमय व्यौहारा ॥ भजन अरु दान पुण्यकर थोरा । अधिक रजोगुणते चित जोरा ॥ क्षमा शांति सब औगुण ढकई । भर्मभूत तजि प्रभु दिशि तकई ॥ ईसा शिष्य साखा बहु भयऊ । पृथ्वीपर जहैं तहैं रमि गयऊ ॥ देश देशमें धर्म प्रचारा । ईसा गुण सब ठौर उचारा ॥ जेहि औसर यह धर्म चलाई । नर भोले थोरी चतुराई ॥ थोरी विद्या बहुत निरअक्षर । धर्मकी गति जाने तब कहैं नर ॥ थोरे ही उपदेशके करते । सब ईसाई धर्मको धरते ॥ यूरूप सबही भयो इसाई । देश एशिया गुण अधिकाई ॥