भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०१० )

बोधसागर

१०२

अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥ शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥ रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥ अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥ देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥ दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥ प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥ महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥ जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥ जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥ दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥ दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥ दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥ दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥ तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥ जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥ फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥ पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥ तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥ घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥ ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥ बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥ दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥ जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥