कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मपौध
( २००९ )
भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै । यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥
इति श्रीधर्मव्यौरा
अथ वेदधर्म व्यौरा
दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव । सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥
चौपाई
सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥ चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥ भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥ कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥ नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥ गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥ धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥ गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥ वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥ ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥ पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥ व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥ केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥ पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥ झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥ झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥
इति वेदधर्म