भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २००८ )

बोधसागर

१००

तृतिये करे करावै पापू । घोर नर्क अह तिनका थापू ॥

दोहा-विविधि कह इबलीस जन, उत्तम मध्यम नीच ।

जस मति तस गति प्रेरिके, ल्यावै तिनको खींच ॥

चौपाई

कोई रजोगुण कर्म कहीजै । कोई मलीन रजोगुण भीजै ॥

कोई सतोगुण धर्म प्रचारा । कोई मलीन सतोगुण धारा ॥

कोई तमोगुण ऐसे जानो । विविधि भेद तिनमाह प्रमानो ॥

पञ्चधर्म षट्धर्म बखाना । इहाँलो विषय वासना नाना ॥

यह षट्धर्म जत्तमें जागे । सकल नारि नर तिनमें लागे ॥

छवो त्याग सप्तम जब चीन्हा । सत्य पन्थपर तब पग दीन्हा ॥

देव कबीर धर्म नयसागर । तापद गहि बीते सब झागर ॥

विषय विकारकी भै तब हानी । सरिता सकल सिंधु ससुहानी ॥

निश्चल होहि पाय प्रिय अपना । जहँ नहिं अमभय केर कल्पना ॥

मन बानीते पार जो होई । ताकी कथा कहे किमि कोई ॥

मीन विहंग कि मारग दूँढ़ा । बुद्धिविहीन विचारन सूढ़ा ॥

पठि गुण तोता कहे कहानी । बिना विचार मूलकी हानी ॥

झूठना

मूल जाने बिना धूल रसरीवरे मीन पग पंथ कहु कौन पावै ॥

दूर नेरे नहीं क्रूर हेरे तही बिना गुरु गम्य तेहि को लखावै ॥

जासुको नाम नहीं रूप नहिं रेख है भेष आलेख कह देख कोई ॥

बकत बहु वाय है सार नहिं पाय है घोषको धर्म गहि भर्म भोई ॥

स्वप्नकी वस्तु जौँ दूँढ़ जागृतमें हाथ आवै नहीं यत्न कीने ।

चारहु दशाते पार सरकार जो तासु दरबार पथ कौन लीने ॥

खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी योग अरु युक्ति सब रहै पोले ॥

दुन्मुनी खातजहँ उन्मुनीफिरत है अलककीझलकको पलकखोले ॥