कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०१५ )
मान सरोवर हंस निवासा । बकुला तहां करहि नहिं वासा ॥ भोजन भैक मीन जिन केरा । तिनको डाबर माह बसेरा ॥ जो हरिनाम खुगे शुचि मोती । बसे मानसर तिनके गोती ॥ सब जीवनके जो हितकारी । परमारथमें तन धन वारी ॥ स्वसंवेदकी आस गहाई । अन्य नती बहु रीति चलाई ॥ निर्मल जल अकाशते आवै । भूमि परत डाबर है जावै ॥ तिमि सब स्वसंवेदते वानी । भिन्न भाव धरिजग प्रकटानी ॥ सत्यपंथके गृही विरागी । परम पुरुषकी सेवा लागी ॥ जुरे समाज जहांयक तीरा । ढोल मृदंग मधुर मखीरा ॥ बजै झांझ खँजरी करताला । बाजन विविधि प्रकार सुताला ॥ सत्य कबीरको नाद उठावै । रहसि-रहसि प्रभुको गुण गावै ॥ सन्त गुरुकी सेवा माहीं । इन्है समान और कोउ नाहीं ॥ परमधर्म गुरुसन्तकी सेवा । ताते मिले पुरातन देवा ॥ धरे जेते धन द्रव्य शुभागे । सब गुरु सन्त सेवमें लागे ॥ गृही होय गुरु साधू सेवै । वैरागी तपमें चित देवै ॥ परम उदार चित जिन केरा । सत्यलोकमें तासु बसेरा ॥
इति स्वसंवेद
अथ स्मार्तमत व्यौरा वर्णन
दोहा—सतगुण रजगुण धर्ममय, स्मृती मत संन्यास ।
उत्तम मध्य कनिष्ठ विधि, कौजै कथा प्रकाश ॥
चौपाई
उत्तम मध्यम जो संन्यासा । सतगुण मयी ताही परकाशा ॥ दीगम्बर दंडी संन्यासी । दोनों धर्म सतो गुण राशी ॥ अब कनिष्ठ संन्यास कहीजै । जब सत रज मिश्रित चित दीजै ॥ कोइ कोइ दुराचार इन माही । मद्य मांसको भोग कराही ॥