कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०१६ )
बोधसागर
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योगी अरु संन्यासी दोई । एक स्वरूप जानिये सोई ॥ इति स्मार्तभत
अथ मीमांसाधर्म वर्णन—चौपाई
रजगुण ब्रह्मा रूप कहावै । धर्म मिमांसा जक्त चलावै ॥ कर्मते श्रेष्ठ और नहिं कोई । कर्महिंते सब रचना होई ॥
इति मीमांसा
अथ मूसा और ईसाधर्म व्यौरा—चौपाई
रजगुण तमगुण जहां मिलाई । मूसाधर्म और ईसाई ॥ होम यज्ञ तौरेत बखाना । यथा वेदविधि कीन प्रमाना ॥ सागपात जैसे तरकारी । तैसे नर मद मांसु अहारी ॥ मानुष घातसे पातक माना । इतर जीव सब साग समाना ॥ मूसा धर्म यहूदी धारा । यहि मतको नहिं अधिक पसारा ॥ मूसाके कोइ शिष्य न रहेऊ । ताते धर्म कि बृद्धि न भयऊ ॥ अबीरामको जो सन्ताना । मूसाधर्म करे परमाना ॥ सतगुणरूप आहि ईसाई । क्षमा शीलतामें अधिकाई ॥ छल बल रहित दीनता धरही । उज्ज्वल किया शौच आचरही ॥ मद्य मांसको करे अहारा । ताते तमगुणमय व्यौहारा ॥ भजन अरु दान पुण्यकर थोरा । अधिक रजोगुणते चित जोरा ॥ क्षमा शांति सब औगुण ढकई । भर्मभूत तजि प्रभु दिशि तकई ॥ ईसा शिष्य साखा बहु भयऊ । पृथ्वीपर जहैं तहैं रमि गयऊ ॥ देश देशमें धर्म प्रचारा । ईसा गुण सब ठौर उचारा ॥ जेहि औसर यह धर्म चलाई । नर भोले थोरी चतुराई ॥ थोरी विद्या बहुत निरअक्षर । धर्मकी गति जाने तब कहैं नर ॥ थोरे ही उपदेशके करते । सब ईसाई धर्मको धरते ॥ यूरूप सबही भयो इसाई । देश एशिया गुण अधिकाई ॥