भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( २०१७ )

थोरे मनुष्य गह्यौ मत ईसा । हिंदू स्थान धर्म धुरदीसा ॥ चरित इहां पादरी आये । विरले जीवहि धर्म गहाये ॥ राज भयौ अंगरेजको जबते । भये अधिक ईसाई तबते ॥ मूसा ईसामतके माहीं । स्वर्ग नर्क निर्णय कछु नाहीं ॥ आतम गुण अरु ज्ञाना ज्ञाना । कछु नहिं इनमें कीन बखाना ॥ मोटा ज्ञान धर्म बतलाई । पुण्य पापकी थाप थपाई ॥

इति मूसाईसा

अथ महम्मद धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण जहाँ रजोगुण पेला । धर्म महम्मदको यह खेला ॥ बिन अपराध जो मानुष मारे । मारि काटि निज धर्म प्रचारे ॥ यह गुण मुसलमानमें कहई । यक अच्छाहकि भक्ति सो गहई ॥ दुतिये गुण इनमें बड़ भारी । अभ्यागत आदर अधिकारी ॥ दान पुण्य अरु उज्वल कर्मा । चित्त उदार महम्मद धर्मा ॥ भये महम्मद ऐसे दाता । आपअलूने साग जो खाता ॥ माल कोरोनको लुटवाई । सह्यौधुरक्सेकाडुःख अधिकाई ॥ वेद धर्मको जैसे देखा । मता महम्मदको तस लेखा ॥ कथा कहानि अधिक मिलाई । सुनी गुणी बहु बात बनाई ॥ स्वर्ग नर्क महि मध्य कहानी । धर्म महम्मद निर्णय ठानी ॥ आत्मवाद कछु ज्ञानको भेदा । जपतपशमदम आदिनिवेदा ॥ मोटा ज्ञान तीन हूको पद । मूसा ईसा धर्म महम्मद ॥

इति महम्मदधर्म :

अथ शक्ति धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

धर्म तमोगुण जो लखि पाया । शक्ती धर्म आदि है माया ॥ भवसागर जिन कीन पसारा । नारीते यह सब संसारा ॥ शिव अरु शक्ती रूप द्वै कीन्हा । दोहू रूप मायाको चीन्हा ॥