भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥ चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥ ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥ कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥ देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥ जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥ अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥ यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥ ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय । परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥ सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥ ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥ नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥ निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥ कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥ जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥ स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥ सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥ इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥

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