भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २००६ )

बोधसागर

९८

सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥ करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥

इति

अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई

सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥ स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥ वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥ ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥ स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥ यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥ ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥

दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।

ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥

चौपाई

षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥ सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥ स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥ स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥ पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥ अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥ पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥ यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥ पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥ इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥ शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥