कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २००५ )
सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥ जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥ षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥ जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥ शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥ एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥ सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥ नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥ केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥
इति वर्णार्थम मिथ्या
अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई
अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥ हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥ कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥ जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥ वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥ नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥ के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥ निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥ बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥ पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥ गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥ यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥ अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥