कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2082, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २००४ )
बोधसागर
९६
उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥ सत्यकबीर वचन
साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय । नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय । बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार । सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥
रमैनी
पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥
शब्द
नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥ पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥ गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥ पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥ जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥ जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥ कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥
चौपाई
वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥ कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥ तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥ गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥ दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥ प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥ काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥ पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥