कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २००३ )
उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥ ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥ कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥ यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥ असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥ जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥ जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥ तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥ पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥ कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥ जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥ पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥ सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥ हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥ जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥ विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥ गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥ पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥ कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥ दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥ रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥ कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥ ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥ वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥ नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥