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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

९५

जीवधर्मबोध

( २००३ )

उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥ ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥ कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥ यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥ असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥ जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥ जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥ तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥ पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥ कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥ जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥ पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥ सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥ हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥ जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥ विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥ गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥ पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥ कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥ दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥ रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥ कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥ ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥ वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥ नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥

( २००४ )

बोधसागर

९६

उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥ सत्यकबीर वचन

साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय । नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय । बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार । सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥

रमैनी

पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥

शब्द

नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥ पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥ गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥ पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥ जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥ जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥ कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥

चौपाई

वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥ कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥ तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥ गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥ दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥ प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥ काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥ पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥

९७

जीवधर्मबोध

( २००५ )

सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥ जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥ षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥ जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥ शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥ एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥ सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥ नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥ केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥

इति वर्णार्थम मिथ्या

अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई

अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥ हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥ कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥ जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥ वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥ नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥ के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥ निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥ बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥ पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥ गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥ यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥ अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥

( २००६ )

बोधसागर

९८

सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥ करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥

इति

अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई

सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥ स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥ वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥ ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥ स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥ यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥ ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥

दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।

ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥

चौपाई

षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥ सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥ स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥ स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥ पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥ अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥ पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥ यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥ पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥ इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥ शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥

११

जीवधर्मबोध

( २००७ )

भिन्न भिन्न पूजा परकाशा । सकल जीव गल डारे फांसा ॥ रजगुण ब्रह्मा है संसारी । कर्मजाल जिन जक्त पसारी ॥ तमगुण रूप महादेव केरा । भवसागरमें ताको डेरा ॥ सतगुन मारग जो कोड धरई । भवसागरके पार उतरई ॥ द्रन्द खेल सतगुणमें बतें । ताहु भिन्नभाव बहु करते ॥ प्रथमहि विष्णु संप्रदा चारी । दुतिये सत्यपंथ आचारी ॥ वेद कि विधि पूरणता पावै । स्वसंवेद कह तब समुहावै ॥ जीवहि अवश्य कर्म सो करनो । सतगुणकी मारग पग धरनो ॥ सात प्रकार कहों पुनि धर्मा । भिन्न-भिन्न तिनको सुन भर्मा ॥ शक्ति निरंजन त्रिगुन है पांचो । वेद विदित शुभ धर्म है सांचो ॥ छठा धर्म कहिये शैतानी । जिनको गुरु इबलीस बखानी ॥ सप्तम धर्म कबीर कृपाला । जरतजक्त जिव जिन प्रतिपाला ॥ प्रथमें ब्रह्मा रजगुण कहिये । कर्मकांड सब ताते गहिये ॥ दुतिमें विष्णु उपासना हेता । तृतिये शंभु योग चित चेता ॥ चौथे ज्ञान निरञ्जन राया । पंचम शक्ति पसान्यौ माया ॥ तीन तीन विधि तिनमें आही । उत्तम मध्यम कनिष्ठ कहाही ॥ छठे धर्म इबलीसको जाई । तीन विभाग ताहुमें होई ॥ ॥ उत्तम कर्म करंता जोई । बुधि विद्या सागर है सोई ॥ कोड गुणगण कोड धनमद पूरे । कोड बाह विजयी है शूरे ॥ जो मद मान सहित हंकारा । मैं बड़ डोरहि तुच्छ विचारा ॥ मोरे योग गुरु कहूँ नाहीं । सो शैतानको पन्थ गहाहीं ॥ उत्तम कर्म जो करे करावै । मलिन कर्म लख दूर परावै ॥ ऐसे सुकर्म करे जो लोगा । ताते नर्क भोग नहि भोगा ॥ तिनको आवागौन न छूटे । योनी संकट पुनि पुनि जूटे ॥ दुतिये आपन उत्तम करनी । और सिखाये सुख कह बरनी ॥

( २००८ )

बोधसागर

१००

तृतिये करे करावै पापू । घोर नर्क अह तिनका थापू ॥

दोहा-विविधि कह इबलीस जन, उत्तम मध्यम नीच ।

जस मति तस गति प्रेरिके, ल्यावै तिनको खींच ॥

चौपाई

कोई रजोगुण कर्म कहीजै । कोई मलीन रजोगुण भीजै ॥

कोई सतोगुण धर्म प्रचारा । कोई मलीन सतोगुण धारा ॥

कोई तमोगुण ऐसे जानो । विविधि भेद तिनमाह प्रमानो ॥

पञ्चधर्म षट्धर्म बखाना । इहाँलो विषय वासना नाना ॥

यह षट्धर्म जत्तमें जागे । सकल नारि नर तिनमें लागे ॥

छवो त्याग सप्तम जब चीन्हा । सत्य पन्थपर तब पग दीन्हा ॥

देव कबीर धर्म नयसागर । तापद गहि बीते सब झागर ॥

विषय विकारकी भै तब हानी । सरिता सकल सिंधु ससुहानी ॥

निश्चल होहि पाय प्रिय अपना । जहँ नहिं अमभय केर कल्पना ॥

मन बानीते पार जो होई । ताकी कथा कहे किमि कोई ॥

मीन विहंग कि मारग दूँढ़ा । बुद्धिविहीन विचारन सूढ़ा ॥

पठि गुण तोता कहे कहानी । बिना विचार मूलकी हानी ॥

झूठना

मूल जाने बिना धूल रसरीवरे मीन पग पंथ कहु कौन पावै ॥

दूर नेरे नहीं क्रूर हेरे तही बिना गुरु गम्य तेहि को लखावै ॥

जासुको नाम नहीं रूप नहिं रेख है भेष आलेख कह देख कोई ॥

बकत बहु वाय है सार नहिं पाय है घोषको धर्म गहि भर्म भोई ॥

स्वप्नकी वस्तु जौँ दूँढ़ जागृतमें हाथ आवै नहीं यत्न कीने ।

चारहु दशाते पार सरकार जो तासु दरबार पथ कौन लीने ॥

खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी योग अरु युक्ति सब रहै पोले ॥

दुन्मुनी खातजहँ उन्मुनीफिरत है अलककीझलकको पलकखोले ॥

१०१

जीवधर्मपौध

( २००९ )

भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै । यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥

इति श्रीधर्मव्यौरा

अथ वेदधर्म व्यौरा

दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव । सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥

चौपाई

सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥ चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥ भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥ कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥ नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥ गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥ धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥ गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥ वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥ ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥ पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥ व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥ केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥ पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥ झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥ झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥

इति वेदधर्म

( २०१० )

बोधसागर

१०२

अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥ शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥ रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥ अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥ देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥ दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥ प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥ महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥ जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥ जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥ दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥ दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥ दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥ दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥ तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥ जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥ फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥ पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥ तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥ घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥ ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥ बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥ दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥ जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥

१०३

जीवधर्मबोध

(२०११)

चौथा काल जैनी जो कहेऊ । वज्रशरीर मनुष को रहेऊ ॥ जैनी करहि तबहि तप भारी । करि करनी सुख धाम सिधारी ॥ अब यह काल होयसो नाही । ज्ञान सुक्ति नहिं तिनके पाहीं ॥ परमारथ न होय बिनदाना । गहे साधु परमारथ बाना ॥ जहँ परमारथ दान कि हानी । तहां सुगति पावै कह प्रानी ॥ जैनमते अब सुक्ति न पाई । अन्य धर्म जिवको सुखदाई ॥ पंचम काल जैनको येहा । ज्ञानी सन्त धरे बहु देहा ॥ और धर्ममें जैनमें नाही । जो परमारथ दान कराही ॥ धर्मके चार चरण बतलाया । सत अरु सौच दान अरु दाया ॥ कलिमें कहा सप्त पदवर्ता । नाम दान कलिमल संहर्ता ॥ जैनमें सप्त शौच अरु दाना । तीनों चरण विभंग बखाना ॥ महाकठिनतप करि जब ध्यावत । चौथकाल कोई गति पावत ॥ अब यहि कालसो व्रतको पाले । एक टांगते धर्म न चाले ॥ संबंधी तन मन धन तीनों । यह प्रमान सब धर्महि कीनों ॥ तन मन धन बिन कार्य न कोई । स्वारथ अरु परमारथ दोई ॥ तन मन दे जब कर सेवकाई । तब धन लाभ होय दुनियाई ॥ धनको त्यागि औरको दीजै । तन मन ताते लाभ लहीजै ॥ तन मन धन दे जिहि जिन साधा । कोई दुनिया कोई हरि अवराधा ॥ तिहुदे सोइ अवश्य लहीजै । जब काहू दिश निज दिल दीजै ॥ तिहु बिन कर्म जो साधा चहई । सो शठ हठ अज्ञानी अहई ॥ तजि धन साधु जो वनमें बसही । घोर घोर तप करि तन कसही ॥ धनको दान दंड तिहि नाही । रहे नहीं धन जिनके पाहीं ॥ दारिद्री अरु भिक्षुक जोई । ताते दान लेत नहिं कोई ॥ जिहि औसर नर वज्र शरीरा । सहे परीसा लहै न पीरा ॥ दुःख अनंत देहीपर परही । जप तप साधु गृही दोउ करही ॥

( २०१२ )

बीधसागर

१०४

महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥ पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥ दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥ धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥ ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥ तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥ जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥ एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥ एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥ राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥ ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥ यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥ क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥ जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥ यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥ यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥ ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥ अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥ वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥ एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥ ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥ सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥ मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥ और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥ इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥

१०५

जीवधर्मबोध

( २०१३ )

अग्नि पौन आदिक जो कहाऊ । इन्द्रके दरवारिनको नाऊ ॥ इन्द्रहि रणमें रावन जीता । बंधन डारिके देतेहि कीता ॥ नृपको जब बंधनमें डारा । मन्त्रिनको कर चेरवा डारा ॥ नीचटहल दरबारिन गहेऊ । अग्नि पौन रावन बस भैऊ ॥ अग्नि पौन आदिक जो कहेऊ । सो सब नाम मनुषको रहेऊ ॥ सुरपति नहीं बंधनमें आवै । मिथ्याती सब कूट बतावै ॥ छनमें इन्द्र प्रलय जग करई । ताहि कौन बंधनमें धरई ॥ प्रलय करे फिर जग प्रकटावै । सो किमि रावनकी बस आवै ॥ ऐसो अग्नि पौन बलकारा । छनमें प्रलय करे संसारा ॥ मिथ्याती सब कूठ वर्णके । अग्नि पौन रह बस रावनके ॥ ब्रह्मन क्षत्री होय लराई । क्षत्री द्विजनको मारि हटाई ॥ परशुराम तब द्विजकुल होई । परमशत्रु क्षत्रीको सोई ॥ ताते अनगिन क्षत्री मारा । तब सुभूमि लीवो औतारा ॥ क्षत्री चक्रवर्त पदधारा । पशुरामको ताने मारा ॥ हनिवर द्वीपकौ राजा जोई । हनोमानको नाना सोई ॥ हनोमान ननिओ रे गैऊ । आदर मान तहां बड़ भैऊ ॥ हनिवर द्वीपमें आदर पाई । ताते हनोमान कहलाई ॥ बानरवंशी क्षत्री सोई । हनोमान विद्याधर होई ॥ रूप अनूप महा छबि जाको । कामदेव औतार है ताको ॥ बज्र अंग बल बरनि न जाई । गुणगणशील जासो अधिकार्ई ॥ राजा पौन जय कहलाये । हनुमान है ताके जाये ॥ पौनते मनुष न जन्मै कोई । यह कपोलकलपित सब होई ॥ हनोमानको बानर भाषा । पीठके ऊपर पूछ सो राखा ॥ कूठ कथा मिथ्याती कहई । नर बानर किमि संगत गहई ॥ बालि सुकंठ आदि नृप जेते । बानरवंशके क्षत्री तेते ॥

( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥ चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥ ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥ कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥ देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥ जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥ अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥ यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥ ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय । परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥ सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥ ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥ नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥ निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥ कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥ जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥ स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥ सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥ इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥

१०७

जीवधर्मबोध

( २०१५ )

मान सरोवर हंस निवासा । बकुला तहां करहि नहिं वासा ॥ भोजन भैक मीन जिन केरा । तिनको डाबर माह बसेरा ॥ जो हरिनाम खुगे शुचि मोती । बसे मानसर तिनके गोती ॥ सब जीवनके जो हितकारी । परमारथमें तन धन वारी ॥ स्वसंवेदकी आस गहाई । अन्य नती बहु रीति चलाई ॥ निर्मल जल अकाशते आवै । भूमि परत डाबर है जावै ॥ तिमि सब स्वसंवेदते वानी । भिन्न भाव धरिजग प्रकटानी ॥ सत्यपंथके गृही विरागी । परम पुरुषकी सेवा लागी ॥ जुरे समाज जहांयक तीरा । ढोल मृदंग मधुर मखीरा ॥ बजै झांझ खँजरी करताला । बाजन विविधि प्रकार सुताला ॥ सत्य कबीरको नाद उठावै । रहसि-रहसि प्रभुको गुण गावै ॥ सन्त गुरुकी सेवा माहीं । इन्है समान और कोउ नाहीं ॥ परमधर्म गुरुसन्तकी सेवा । ताते मिले पुरातन देवा ॥ धरे जेते धन द्रव्य शुभागे । सब गुरु सन्त सेवमें लागे ॥ गृही होय गुरु साधू सेवै । वैरागी तपमें चित देवै ॥ परम उदार चित जिन केरा । सत्यलोकमें तासु बसेरा ॥

इति स्वसंवेद

अथ स्मार्तमत व्यौरा वर्णन

दोहा—सतगुण रजगुण धर्ममय, स्मृती मत संन्यास ।

उत्तम मध्य कनिष्ठ विधि, कौजै कथा प्रकाश ॥

चौपाई

उत्तम मध्यम जो संन्यासा । सतगुण मयी ताही परकाशा ॥ दीगम्बर दंडी संन्यासी । दोनों धर्म सतो गुण राशी ॥ अब कनिष्ठ संन्यास कहीजै । जब सत रज मिश्रित चित दीजै ॥ कोइ कोइ दुराचार इन माही । मद्य मांसको भोग कराही ॥

( २०१६ )

बोधसागर

१०८

योगी अरु संन्यासी दोई । एक स्वरूप जानिये सोई ॥ इति स्मार्तभत

अथ मीमांसाधर्म वर्णन—चौपाई

रजगुण ब्रह्मा रूप कहावै । धर्म मिमांसा जक्त चलावै ॥ कर्मते श्रेष्ठ और नहिं कोई । कर्महिंते सब रचना होई ॥

इति मीमांसा

अथ मूसा और ईसाधर्म व्यौरा—चौपाई

रजगुण तमगुण जहां मिलाई । मूसाधर्म और ईसाई ॥ होम यज्ञ तौरेत बखाना । यथा वेदविधि कीन प्रमाना ॥ सागपात जैसे तरकारी । तैसे नर मद मांसु अहारी ॥ मानुष घातसे पातक माना । इतर जीव सब साग समाना ॥ मूसा धर्म यहूदी धारा । यहि मतको नहिं अधिक पसारा ॥ मूसाके कोइ शिष्य न रहेऊ । ताते धर्म कि बृद्धि न भयऊ ॥ अबीरामको जो सन्ताना । मूसाधर्म करे परमाना ॥ सतगुणरूप आहि ईसाई । क्षमा शीलतामें अधिकाई ॥ छल बल रहित दीनता धरही । उज्ज्वल किया शौच आचरही ॥ मद्य मांसको करे अहारा । ताते तमगुणमय व्यौहारा ॥ भजन अरु दान पुण्यकर थोरा । अधिक रजोगुणते चित जोरा ॥ क्षमा शांति सब औगुण ढकई । भर्मभूत तजि प्रभु दिशि तकई ॥ ईसा शिष्य साखा बहु भयऊ । पृथ्वीपर जहैं तहैं रमि गयऊ ॥ देश देशमें धर्म प्रचारा । ईसा गुण सब ठौर उचारा ॥ जेहि औसर यह धर्म चलाई । नर भोले थोरी चतुराई ॥ थोरी विद्या बहुत निरअक्षर । धर्मकी गति जाने तब कहैं नर ॥ थोरे ही उपदेशके करते । सब ईसाई धर्मको धरते ॥ यूरूप सबही भयो इसाई । देश एशिया गुण अधिकाई ॥

१०९

जीवधर्मबोध

( २०१७ )

थोरे मनुष्य गह्यौ मत ईसा । हिंदू स्थान धर्म धुरदीसा ॥ चरित इहां पादरी आये । विरले जीवहि धर्म गहाये ॥ राज भयौ अंगरेजको जबते । भये अधिक ईसाई तबते ॥ मूसा ईसामतके माहीं । स्वर्ग नर्क निर्णय कछु नाहीं ॥ आतम गुण अरु ज्ञाना ज्ञाना । कछु नहिं इनमें कीन बखाना ॥ मोटा ज्ञान धर्म बतलाई । पुण्य पापकी थाप थपाई ॥

इति मूसाईसा

अथ महम्मद धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण जहाँ रजोगुण पेला । धर्म महम्मदको यह खेला ॥ बिन अपराध जो मानुष मारे । मारि काटि निज धर्म प्रचारे ॥ यह गुण मुसलमानमें कहई । यक अच्छाहकि भक्ति सो गहई ॥ दुतिये गुण इनमें बड़ भारी । अभ्यागत आदर अधिकारी ॥ दान पुण्य अरु उज्वल कर्मा । चित्त उदार महम्मद धर्मा ॥ भये महम्मद ऐसे दाता । आपअलूने साग जो खाता ॥ माल कोरोनको लुटवाई । सह्यौधुरक्सेकाडुःख अधिकाई ॥ वेद धर्मको जैसे देखा । मता महम्मदको तस लेखा ॥ कथा कहानि अधिक मिलाई । सुनी गुणी बहु बात बनाई ॥ स्वर्ग नर्क महि मध्य कहानी । धर्म महम्मद निर्णय ठानी ॥ आत्मवाद कछु ज्ञानको भेदा । जपतपशमदम आदिनिवेदा ॥ मोटा ज्ञान तीन हूको पद । मूसा ईसा धर्म महम्मद ॥

इति महम्मदधर्म :

अथ शक्ति धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

धर्म तमोगुण जो लखि पाया । शक्ती धर्म आदि है माया ॥ भवसागर जिन कीन पसारा । नारीते यह सब संसारा ॥ शिव अरु शक्ती रूप द्वै कीन्हा । दोहू रूप मायाको चीन्हा ॥

(२०१८)

बोधसागर

११०

जब संचट होय दोहु रूपा । ताते जीव परे भ्रम कृपा ॥ द्वंदरूप मायाको खेला । ताते जीवको ज्ञान सकेला ॥ ज्ञानते माया पंथ बिरोधी । भवसागर पद जीव प्रबोधी ॥ हिंसा कर्म बुद्धि जिव घाटी । ज्ञानद्वारे पर दीनो टाटी ॥ भोगे भोग भोगमें रहई । भोगवासना चितमें गहई ॥ भोगमें भर्मि रहा सब लोगा । आवे जाय सहे सो सोगा ॥

इति

अथ अघोर धर्मव्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण पर तमगुण सरसाई । धर्म अघोर परम कठिनाई ॥ नर पशु जीव सकल धरखाही । धर्म विचित्र कहो कह जाही ॥ डुराचारको अन्त अघोरी । जिमि अचार वैष्णव घोरी ॥

इति अघोरधर्म

अथ विचारणीय वार्ता

दोहा—येते धर्म बखानेछ, इनते कहूँ जो और । सकल त्रिगुणमय भक्त हैं, जक्तमाह सब ठौर ॥ त्रिगुणातीत जो कोय कहे, त्रिगुणातीत न होय । कहनको त्रिगुणातीत हो, त्रिगुणमें बांधा सोय ॥ जीवनसुक्त विदेह जो, सब तिरगुणके फन्द । सार शब्द लहि पार हो, तब जिव होय अनन्द ॥

चौपाई

जेते धर्म प्रचारक होही । कहो न जाय कहै का ओही ॥ जिमि नृप थापे देशन देशा । धर्म प्रचारक जगमें ऐसा ॥ एक प्रानि दुतिये मत खंडा । अपनो धर्म धारा प्रचंडा ॥ यक जकती यक भकती पाला । दोनों ते प्रभु बसे निराला ॥

१११

जीवधमबोध

( २०१९ )

बिन गुरु गम सो लखो न जाई । कोटिन विधिकिन करे उपाई ॥ यह दश वस्तु आपमें देखो । पांच तत्त्व गुण तीन विशेषो ॥ ब्रह्मजीव माया कहि दीनी । एकते भिन्न न दुतिया कीनी ॥ सदा काल सो रहै सघट्टा । कबहु न बिलगहो तिनको ठट्टा ॥ सब रचना इनहीते होई । इनको पूजाकर सब कोई ॥ प्रथमैं पृथ्वीकी है पूजा । मूरत थाप आपते दूजा ॥ आठ प्रकारको प्रतिमा कीने । ताहि ध्याय जिव ईश्वर चीन्हे ॥ दुतिये जलकरि ईश्वर ध्यावै । योग कियाआदिक मनलावै ॥ शौचअचार आदिक सब जोई । वरुण देवकी पूजा होई ॥ तृतिये अग्नि हरी सेव अनूपा । यज्ञ होम धूप आदिक दीपा ॥ चौथे पौन देवकी सेवा । प्राणायाम आदिकको भेवा ॥ पंचम शून्य समाधि बखानी । पुनिरिगुणपुनि आदि भवानी ॥ तिनपर ज्योति निरंजन जागे । सकल जीव भक्तीमें लागे ॥ वेदमें यह पूजा बतलाई । वरुण चन्द्र इंद्री रविराई ॥ अग्नि सरस्वती पृथ्वी पौना । तनमें सब रहते लख तौना ॥ थूल वस्तु येती दरसाई । सूक्ष्म थूलमें रही समाई ॥ थूलमें सूक्ष्म सूक्ष्ममें थूला । सूक्ष्म सर्व थूलको मूला ॥ सो सूक्ष्म मोहिते नहीं न्यारा । मोही पाहि बसे मो प्यारा ॥ जेती पूजा जगके माहीं । सो सब अपनो दूसर नाही ॥

छन्द अस्कंध

दिलदेउलमें देव पुरातन पूज पुजारी तारा है । दिलहीमें पूजा सामग्री दिलही ठाकुरद्वारा है ॥ कहुँ तीरथ कहुँ मूरत थापै सबपरपंच पसारा है । मनका फेरन कोई जाने मन का फेरत हारा है ॥ उठत बैठत परत रातदिन कानो अंगुली डारा है ।

( २०२० )

बोधसागर

११२

रोजा और नमाज गुजारे पुतली स्वांगसँवारा है ॥ मस्जिद चूनाकंकर है क्यों सौ सौ टक्कर मारा है । दिलको खोज देवानेमोछा दिल अछह दीदारा है ॥

चौपाई

अहं अहं ब्रह्म बोलब नहीं जोगू । ब्रह्मकी गति जाने कहैं लोगू ॥ अहं ब्रह्म ब्रह्मा जो भाषा । अपने कर्मको ज्ञान न राषा ॥ बिन विचार सबही जिव भटके । सतगुरु त्याग भर्मपुर अटके ॥ भेडर चाल गहै संसारी । रंच न हृदये बुद्धि विचारी ॥ जाने कहवां पुरा पतंगा । दीपक परे होय तन भंगा ॥ विछाजालजौरखग लखि पावत । दाना चुगनसो कबहुँ न आवत ॥ बिना विचार धर्म जिव धरही । सब मिलि बहुरि बड़ाई करही ॥ सदा काल जो करे विचारा । तिनके हृदय होय उजियारा ॥ रावनको जो राक्षस कहेऊ । वैर भाव द्विज ताते गहेऊ ॥ ब्राह्मण चार वर्ण शिर मौरा । तासु वचन प्रमाण सब ठौरा ॥ झूठ होयकै सत्य बखाना । विप्र वचन सब करे प्रमाना ॥ रावन रूप विप्र अस कहेऊ । नौनर यक खरको सिर गहेऊ ॥ विप्र रामलीलाकी वारी । रावनकी जब मूर्ति सँवारी ॥ नौशिर नर अकार बनावै । यक शिर गर्दभको देखलावै ॥ गर्दभको जौ शीस सँवारा । सो सब शिरनको ऊपर धारा ॥ गर्दभशीस भले सब देखे । निंदा हंसी होय यहि लेखे ॥ मनुष्यते रावन राक्षस भैऊ । खरनिश्चय पुनि मिश्रितकियऊ ॥ ऐसो विप्र वचन प्रमाना । चार वर्णके लोगन माना ॥ जस रावनमें औगुण मानी । रामचन्द्र तिमिसबगुणखानी ॥ जती रावणता गुणगाहा । सीतारामहि कबिन सराहा ॥ रामचंद्र निजु सखा समेता । गुणगणअतुलित कहा कविकेता ॥

११३

जीवधर्मबोध

( २०२१ )

तिमि दोषी दशकंध समाजा । नरगह सत जा कह कवि राजा ॥ परवत सम रावन बतलाई । मृदुल मनोहर सिय रघुराई ॥ शाह सिकन्दर जो यूनानी । ताने विजय कीन युग जानी ॥ जीत्यौ महि रिपु सागर बंदर । दोय शृङ्गशिर गह्यो सिकन्दर ॥ पारस देशको बकरा चीन्हा । जब सो भूमि विजयनृप कीन्हा ॥ शीसपै शाह गह्यो सो गहना । शृंगसिकन्दर ताको कहना ॥ शृंगसहित सिकन्दर सोई । तिमि रावन दशकन्धर होई ॥ यथा सिकन्दर शृंगनवाला । तिमि रावन बीसभुज दशभाला ॥ सहसबाहु ब्रह्मा चतुरानन । विष्णु चतुर्भुज अरू षट आनन ॥ पंचमुखी शिव आदि अनेका । जीवन जाने बिना विवेका ॥ ऐसहि द्रन्द परा संसारा । झूठ सांचकर कौन विचारा ॥ कालभेदको ऐसहि देखा । समुझे बिना करे सब लेखा ॥ द्रापर अन्त भो कलियुग आदी । कौरौ पंडौ भये विषादी ॥ करणराय जब बिनती कीने । परशुरामसे विद्या लीने ॥ परशुराम रघुराम जो दोई । एकै समै दोहुनको होई ॥ जाशिवन्त दुबिदा हनुमाना । शृंगी ऋषि आदिक नर नाना ॥ राजा मय मेरटको जोई । रावन शशुर कहावै सोई ॥ राजा जनक अरु सुनिमुखदेवा । व्यास वशिष्ठ जो भाषे भेवा ॥ इत्यादिक वृत्तांत बहु चाला । सो सब रामकृष्णके काला ॥ कालको भेद न कतहु मिलाया । जक्त जीव माया भरमाया ॥ झूठहु सत्य शुद्ध सो लागा । सत्यको झूठ जानी जिव त्यागा ॥

दोहा—आदम आधे दिवसलो, कीन बिहिस्त निवास । पांचसो वर्षसो अर्धदिन, महम्मद धर्मप्रकाश ॥ कालको मेल सिलै नहिं, सो मायाकी खोट । कहुं पलभरी कहुं वर्षदिन, कहु भासे युग कोट ॥

( २०२२ )

बोधसागर

११४

चौपाई

रावन बहिन बिचर वन वाटा । लक्ष्मण तासु नासिका काटा ॥ सो सुनि रावन कोधित भैऊ । छल बल करि सीता हरि लैऊ ॥ कोई न लक्ष्मण दोष लगावै । सब औगुण रावणको गावै ॥ निश्चर कीश शृंग टुम धारी । रावन रघुपति सैन सँवारी ॥ विविधि भांतिको बिना समाजा । नरगह सत जो कह कविराजा ॥ राम शत्रु रावण जिमि राक्षस । कृष्णके कंसादिक वैरी तस ॥ कंस कृष्ण मामा जग जाना । कर्महि राक्षस और न आना ॥ बेद महाभारत अस कहेऊ । कौन देवता मोहित भैऊ ॥ नाम केसरी वानर चीन्हा । तासु नारिसंग भोग सो कीन्हा ॥ ताते हनुमान प्रकटाना । सोई कौन पुत्र जगजाना ॥ बुधिवंतो मन देख विचारी । वानरके नहिं कोई नारी ॥ पशु पंछी कोई ब्याह न जूटी । जेहि संगर मैं सो तासु बधूटी ॥ पौन देवता गुण गण धामा । पशुलखिसोंकिमिहोय सकामा ॥ जांबुवंत जम्बूको राजा । रिच्छप रामके संग विराजा ॥ कृष्णशशुर पुनि ताहि बखाना । दियौ ताहि निज कन्यादाना ॥ रीछकी पुत्री रीछिन होई । मानुष संगमेलि नहिं कोई ॥ राक्षसवंशी वानर वंशी । रीछ नाग बछरा खरवंशी ॥ इत्यादिक सब गीत कहावै । बिन जाने कोई भेद न पावै ॥ ब्रह्मन ऐसी कथा उचारा । जैनबुद्धि विष्णु औतारा ॥ तनधरि असुरनको भरमाया । यज्ञ करन से तिन्है हटाया ॥ असुरन यज्ञ त्यागि जब दैऊ । सो सब अबल ताहिते भैऊ ॥ करि करि यज्ञ विप्रबल पाई । असुरनको तब मारि हटाई ॥ जैन बोध दायामय धर्मा । तिनके कहा असुरके कर्मा ॥ कर्ता पुरुष जो परम त्रिवेकी । सबके संग करै सो नेकी ॥