भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधमबोध

( २०१९ )

बिन गुरु गम सो लखो न जाई । कोटिन विधिकिन करे उपाई ॥ यह दश वस्तु आपमें देखो । पांच तत्त्व गुण तीन विशेषो ॥ ब्रह्मजीव माया कहि दीनी । एकते भिन्न न दुतिया कीनी ॥ सदा काल सो रहै सघट्टा । कबहु न बिलगहो तिनको ठट्टा ॥ सब रचना इनहीते होई । इनको पूजाकर सब कोई ॥ प्रथमैं पृथ्वीकी है पूजा । मूरत थाप आपते दूजा ॥ आठ प्रकारको प्रतिमा कीने । ताहि ध्याय जिव ईश्वर चीन्हे ॥ दुतिये जलकरि ईश्वर ध्यावै । योग कियाआदिक मनलावै ॥ शौचअचार आदिक सब जोई । वरुण देवकी पूजा होई ॥ तृतिये अग्नि हरी सेव अनूपा । यज्ञ होम धूप आदिक दीपा ॥ चौथे पौन देवकी सेवा । प्राणायाम आदिकको भेवा ॥ पंचम शून्य समाधि बखानी । पुनिरिगुणपुनि आदि भवानी ॥ तिनपर ज्योति निरंजन जागे । सकल जीव भक्तीमें लागे ॥ वेदमें यह पूजा बतलाई । वरुण चन्द्र इंद्री रविराई ॥ अग्नि सरस्वती पृथ्वी पौना । तनमें सब रहते लख तौना ॥ थूल वस्तु येती दरसाई । सूक्ष्म थूलमें रही समाई ॥ थूलमें सूक्ष्म सूक्ष्ममें थूला । सूक्ष्म सर्व थूलको मूला ॥ सो सूक्ष्म मोहिते नहीं न्यारा । मोही पाहि बसे मो प्यारा ॥ जेती पूजा जगके माहीं । सो सब अपनो दूसर नाही ॥

छन्द अस्कंध

दिलदेउलमें देव पुरातन पूज पुजारी तारा है । दिलहीमें पूजा सामग्री दिलही ठाकुरद्वारा है ॥ कहुँ तीरथ कहुँ मूरत थापै सबपरपंच पसारा है । मनका फेरन कोई जाने मन का फेरत हारा है ॥ उठत बैठत परत रातदिन कानो अंगुली डारा है ।