भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2098, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2098

( २०२० )

बोधसागर

११२

रोजा और नमाज गुजारे पुतली स्वांगसँवारा है ॥ मस्जिद चूनाकंकर है क्यों सौ सौ टक्कर मारा है । दिलको खोज देवानेमोछा दिल अछह दीदारा है ॥

चौपाई

अहं अहं ब्रह्म बोलब नहीं जोगू । ब्रह्मकी गति जाने कहैं लोगू ॥ अहं ब्रह्म ब्रह्मा जो भाषा । अपने कर्मको ज्ञान न राषा ॥ बिन विचार सबही जिव भटके । सतगुरु त्याग भर्मपुर अटके ॥ भेडर चाल गहै संसारी । रंच न हृदये बुद्धि विचारी ॥ जाने कहवां पुरा पतंगा । दीपक परे होय तन भंगा ॥ विछाजालजौरखग लखि पावत । दाना चुगनसो कबहुँ न आवत ॥ बिना विचार धर्म जिव धरही । सब मिलि बहुरि बड़ाई करही ॥ सदा काल जो करे विचारा । तिनके हृदय होय उजियारा ॥ रावनको जो राक्षस कहेऊ । वैर भाव द्विज ताते गहेऊ ॥ ब्राह्मण चार वर्ण शिर मौरा । तासु वचन प्रमाण सब ठौरा ॥ झूठ होयकै सत्य बखाना । विप्र वचन सब करे प्रमाना ॥ रावन रूप विप्र अस कहेऊ । नौनर यक खरको सिर गहेऊ ॥ विप्र रामलीलाकी वारी । रावनकी जब मूर्ति सँवारी ॥ नौशिर नर अकार बनावै । यक शिर गर्दभको देखलावै ॥ गर्दभको जौ शीस सँवारा । सो सब शिरनको ऊपर धारा ॥ गर्दभशीस भले सब देखे । निंदा हंसी होय यहि लेखे ॥ मनुष्यते रावन राक्षस भैऊ । खरनिश्चय पुनि मिश्रितकियऊ ॥ ऐसो विप्र वचन प्रमाना । चार वर्णके लोगन माना ॥ जस रावनमें औगुण मानी । रामचन्द्र तिमिसबगुणखानी ॥ जती रावणता गुणगाहा । सीतारामहि कबिन सराहा ॥ रामचंद्र निजु सखा समेता । गुणगणअतुलित कहा कविकेता ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 2098, कुल 2136 में से · BharatKosha