भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०२२ )

बोधसागर

११४

चौपाई

रावन बहिन बिचर वन वाटा । लक्ष्मण तासु नासिका काटा ॥ सो सुनि रावन कोधित भैऊ । छल बल करि सीता हरि लैऊ ॥ कोई न लक्ष्मण दोष लगावै । सब औगुण रावणको गावै ॥ निश्चर कीश शृंग टुम धारी । रावन रघुपति सैन सँवारी ॥ विविधि भांतिको बिना समाजा । नरगह सत जो कह कविराजा ॥ राम शत्रु रावण जिमि राक्षस । कृष्णके कंसादिक वैरी तस ॥ कंस कृष्ण मामा जग जाना । कर्महि राक्षस और न आना ॥ बेद महाभारत अस कहेऊ । कौन देवता मोहित भैऊ ॥ नाम केसरी वानर चीन्हा । तासु नारिसंग भोग सो कीन्हा ॥ ताते हनुमान प्रकटाना । सोई कौन पुत्र जगजाना ॥ बुधिवंतो मन देख विचारी । वानरके नहिं कोई नारी ॥ पशु पंछी कोई ब्याह न जूटी । जेहि संगर मैं सो तासु बधूटी ॥ पौन देवता गुण गण धामा । पशुलखिसोंकिमिहोय सकामा ॥ जांबुवंत जम्बूको राजा । रिच्छप रामके संग विराजा ॥ कृष्णशशुर पुनि ताहि बखाना । दियौ ताहि निज कन्यादाना ॥ रीछकी पुत्री रीछिन होई । मानुष संगमेलि नहिं कोई ॥ राक्षसवंशी वानर वंशी । रीछ नाग बछरा खरवंशी ॥ इत्यादिक सब गीत कहावै । बिन जाने कोई भेद न पावै ॥ ब्रह्मन ऐसी कथा उचारा । जैनबुद्धि विष्णु औतारा ॥ तनधरि असुरनको भरमाया । यज्ञ करन से तिन्है हटाया ॥ असुरन यज्ञ त्यागि जब दैऊ । सो सब अबल ताहिते भैऊ ॥ करि करि यज्ञ विप्रबल पाई । असुरनको तब मारि हटाई ॥ जैन बोध दायामय धर्मा । तिनके कहा असुरके कर्मा ॥ कर्ता पुरुष जो परम त्रिवेकी । सबके संग करै सो नेकी ॥

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