कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०२३ )
काहूको नहीं सो भरमावै । राग द्वेष नहीं ताको भावै ॥ ब्रह्मन वैर जाहिसे गहेऊ । वेदविरोधी असुर सो कहेऊ ॥ पशुपंछी नरको दुःख देही । असुर कर्मकर असुर है येही ॥ कारे राते गोरें अंगा । असुर बखाने नाना ढंगा ॥ असुर कर्म जब जो नर त्यागा । सो अवश्य सुर होय सुभागा ॥ लघु दीरघ तन सबही नरके । होहि सुरासुर कर्महि करके ॥ अजौ विप्र जैनीके द्रोही । औसर पाय देत दुःख ओही ॥ तिर्थकरकी मूर्ति जो आही । बाहर जैन निकास जो ताही ॥ ब्राह्मण तब असक्रोध गहाई । पहुँचै ले निजु सरा सहाई ॥ प्रतिमाके ऊपर तेहि बारा । पाथर ईंट करै बौछारा ॥ मुसलमान अस बचन सुनाया । कतल हुकुम अछाहते आया ॥ जो अछाह कतलपै राजी । तो एकै मत जग किन साजी ॥ महम्मदमत जगमें फैलावत । और सकलमत दूर बहावत ॥ जो कलाम अछाह कहाई । यह कुरान असमानते आई ॥ सो अछाह निकटकै कहाई । रह्यौ चराचरमें सो पूरी ॥ सोई कुरान ऐसो प्रकाशी । शहर गते प्रभु निकट निवासी ॥ कंठ किनसते निकट जो रहई । पुनितेहिकिमिअकाशपरकहई ॥ शहरगते हरि निकट बताई । तासु कलाम दूर किमि जाई ॥ अस नरें अछाह बतावै । किमि कलाम असमानते आवै ॥ जहाँ अछाह तहाँ अछाह कलामा । अछाह निकट दूर कह कामा ॥ जो अछाहको नहीं लखि पाया । तेहि कलाम असमानते आया ॥ जो अछाहको नहीं पहिचाना । किमि ताकी कलामको जाना ॥ जबैह कतलते प्रभु नहीं राजी । भ्रमकरि भूले पंडित काजी ॥ कोई कह प्रभु मैं आखिन देखा । चर्मदष्टिको मिथ्या लेखा ॥ चर्मदष्टि सब माया भासा । जो भासा सो सकल विनासा ॥