भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०२४ )

बोधसागर

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कोइ कह मैं कोई ठौरमें गैऊ । प्रभुके संग बातकही भैऊ ॥ कोई कह मैं प्रभु सपने देखी । कोई कहै घटही मैं देखी ॥ कोइ कह मो प्रति भै नभवानी । झूठ साच मैं ताते जानी ॥ कोइ कह मैं लखि ज्ञानके द्वारा । सो कस जस बिजुली चमकारा ॥ झूठ सांच भल नहीं लखि पावै । और बात कह्यु और बतावै ॥ यह सब जिवकी भर्म कहानी । विरला कोइ ईश्वर पहिचानी ॥ बिना ज्ञानके सब यह बाते । ज्ञानभये भ्रम रहै न ताते ॥ जो कोइ साधु ज्ञानके खानी । प्रभु इच्छा सब आपै जानी ॥ तिन्है न स्वपना नहीं न भवानी । नहीं कहैं अनतबतकही ठानी ॥ ज्ञान द्वार हरदम हरिदरसै । दूर जाय कह तापद परसै ॥ चार वर्ण ब्रह्मा परकासी । तिमि शंकर तनते संन्यासी ॥ शीसते पुरी देह निजु गहेऊ । पुनि भारती माथसे कहेऊ ॥ जीभनोकते सरस्वती जाय । गिरपर्वत दोऊ भुजा उपाय ॥ पसुलीते सागर तन गन्नों । दोहु जँघते बन आरन्नों ॥ दो पदसे तीर्थआश्रम तनधारै । शंकरसे प्रकटे इमि सारे ॥ जस बिचार जिवमाह प्रकासा । सो प्रतक्ष है ताको भासा ॥ केते ऐसे भये परपंची । छल करि ग्रंथ नयौ निज रंची ॥ छल बल करि निज नाम छपावै । जगमें इमि निज धर्म चलावै ॥ पूर्वाचार्य श्रेष्ठ मत धारी । ग्रंथको करता ताहि पुकारी ॥ श्रेष्ठ पुरुषको रचित विचारी । होय ग्रंथको आदर भारी ॥ अकबरशाह वोजीर जो फैजी । नयौ धर्म परचारक पैजी ॥ ताने नयौ कुरान बनाई । एक वृक्षके बीच छपाई ॥ अकबर शाहसे जाय सुनाया । मोकहैं राति स्वप्न यकआया ॥ तुमरे नाम नबूबत आई । है कुरान तरुमाह छपाई ॥ अकबरशाह अचंमित भयऊ । शीघ्र ताहि तरुतर चलि गयऊ