कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०२५ )
बृक्षको चीर कुरान निकारा । फेजी छल खुल्लिगो तिहिबारा ॥ ऐसे केते कपटी जगमें । करे बिगार धर्मकी मगमें ॥ पंडित कह पै पंडित नाहीं । विद्या देखि जीव भरमाहीं ॥ कठिन प्रपंच करे सो लोगा । विद्या पढ़ न भक्ति संयोगा ॥ विद्वज्जन हैं द्वैविधि वक्ता । एक भक्त यक जत्तको ठगता ॥ षट् पशु ऐसे कीन प्रमाना । प्रथमैं वेद पशुको जाना ॥ वेदादिक पढ़ि ग्रंथ अनेका । वेद पशु न हृदय विवेका ॥ दुतिय देवपशु गह सुर पक्षा । कह सुर श्रेष्ठ करे जग रक्षा ॥ तृतिये नर पशु ताको कहते । श्रेष्ठ मनुषको पक्ष जो गहते ॥ चौथे शास्त्र पशु शास्त्र ले बोले । पुनि पंचम पुराण पशु टोले ॥ छठे नारि पशु लंपट भाषे । ये षट्पशु विचार नहीं राखे ॥
दोहा-गुरुपशु नरपशु वेदपशु, त्रियापशु संसार । मानुष सोई जानिये, जाके हृदय विचार ॥
इति विचारणीय वार्ता
अथ धर्मसार वर्णन
दोहा-सर्व धर्म परमान यह, ईश्वर समरथ सत्य । किहि विधि सो प्रभु रीझई, कोइ न जाने गत्य ॥
चौपाई
शुभ कर्मनते हरि हर खाहीं । यह प्रमान सब धर्मनमाहीं ॥ शुभ अरु अशुभ कर्म द्वै राखी । दोनों कर्म धर्मते भाखी ॥ समरथ करता दोहुते न्यारा । ताकी गति को जाननहारा ॥ न्याय मिमांसा जैनी भाषे । केते ऋषि सुनि सोइ मद राखे ॥ जीव स्वच्छंद कर्म अधिकारी । जस चाहे तस कार्य सँवारी ॥ केते साधु कथै विपरीती । जिव नहीं सके कर्मकुलजीती ॥ कर्ताकी गति काहु न जाना । कथे अनेकन वेद पुराना ॥
नं. ११ बोधसागर-