कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
११८
जापर कृपा करे सो साईं । ताकी बाँह गहे बरियाई ॥ ब्रह्मानंद बनावै ताही । सबते श्रेष्ठ होय जिव वाही ॥ बहुविधि जिवशुभकर्म जो करई । बिन प्रभु दया कार्य नहिं सरई ॥ बार बार सो प्रभुहिं नमामी । सर्व समर्थ सर्वके स्वामी ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
अवधू कुदरतकी गति न्यारी ।
रंक नेवाज करे वह राजा भूपति करे भिखारी । वाते लोग हरफ नहिं लागे चंदन फूल न फूला ॥ मच्छशिकारी रमै जंगल बिच सिंह ससुंदर झूला । रेडरूख भयौ मलयागिर चहुँदिश फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखे अन्ध तमासा । पंगा मेरु सुमेरु उलेंचै त्रिभुवन सुक्ता डोले । गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशे अनहद बानी बोले ॥ आकाशहिं बांधि पताल पठावै शेष स्वर्गपर राजे । कहैं कबीर राम हैं राजा जो कछु करे सो साजे ॥
चौपाई
महागृह सुनिवर तप कीने । अंत नर्कमें बासा लीने ॥ पतित जौ नर्क भोगवे लायक । कृपा कीने कीन सुरनायक ॥ जौ मैं कर्मकरन समरथा । ज्ञानसुक्ति तौ सब ममहत्था ॥ मैं हौ कौन कर्म है काको । जीव नहीं जाने परिपाको ॥ जौ यह जाने मैं कछु नाहीं । तौ अभिमान दूर दुरि जाहीं ॥
सत्यकबीर-वचन
साखी-कबीर-पैठा है सब घटनमें, बैठा है संचेत । जब जैसी गति चाहत है तब तैसी मति देत ॥ कबीर-बहुबंधनते बांधिया, एक बेचारा जीव । जीव बेचारा क्या करे, जौ न छोड़ावै पीव ॥