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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २०२६ )

बोधसागर

११८

जापर कृपा करे सो साईं । ताकी बाँह गहे बरियाई ॥ ब्रह्मानंद बनावै ताही । सबते श्रेष्ठ होय जिव वाही ॥ बहुविधि जिवशुभकर्म जो करई । बिन प्रभु दया कार्य नहिं सरई ॥ बार बार सो प्रभुहिं नमामी । सर्व समर्थ सर्वके स्वामी ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

अवधू कुदरतकी गति न्यारी ।

रंक नेवाज करे वह राजा भूपति करे भिखारी । वाते लोग हरफ नहिं लागे चंदन फूल न फूला ॥ मच्छशिकारी रमै जंगल बिच सिंह ससुंदर झूला । रेडरूख भयौ मलयागिर चहुँदिश फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखे अन्ध तमासा । पंगा मेरु सुमेरु उलेंचै त्रिभुवन सुक्ता डोले । गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशे अनहद बानी बोले ॥ आकाशहिं बांधि पताल पठावै शेष स्वर्गपर राजे । कहैं कबीर राम हैं राजा जो कछु करे सो साजे ॥

चौपाई

महागृह सुनिवर तप कीने । अंत नर्कमें बासा लीने ॥ पतित जौ नर्क भोगवे लायक । कृपा कीने कीन सुरनायक ॥ जौ मैं कर्मकरन समरथा । ज्ञानसुक्ति तौ सब ममहत्था ॥ मैं हौ कौन कर्म है काको । जीव नहीं जाने परिपाको ॥ जौ यह जाने मैं कछु नाहीं । तौ अभिमान दूर दुरि जाहीं ॥

सत्यकबीर-वचन

साखी-कबीर-पैठा है सब घटनमें, बैठा है संचेत । जब जैसी गति चाहत है तब तैसी मति देत ॥ कबीर-बहुबंधनते बांधिया, एक बेचारा जीव । जीव बेचारा क्या करे, जौ न छोड़ावै पीव ॥

११९

जीवधर्मबोध

( २०२७ )

कबीर-मनको मनोरथछोडिदे, तेरा किया न होय । पानीमें धिंव निकले तो, रूखा खाय न कोय ॥

नानकशाह वचन

करै करावै आपै आप । मानुपकै कछु नाहीं हाथ ॥ जो कहै कि मैं कुछ कर्ता । फिर फिर गर्भ योनिमें फिरता ॥

चौपाई

मैं कछु नहिं कछु है मेरा । अहमित जे अज्ञानते घेरा ॥ जो कोई पायौ ज्ञान अमोला । अहंब्रह्म आपा लखि बोला ॥ ताहूकी यह दुर गति देखे । लखि नहिंपरतअलखयहिलेखे ॥

सत्यकबीर वचन-रेखाता

मालिन पुकारे हे पिया है हे साहेब तूने क्या किया ॥ यक बून्द लज्जत कारने मन्सूर सूली यौ दिया ॥ जल जलकि रोवै माछरी बनबनके रोवै मोरया ॥ महलोकि रोवै बीबिया अल्लाह इलाही क्या किया ॥ कायाके अंदर खोजिले छज्जेमें तेरा जीव है ॥ कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुजहिमें तेरा पीव है ॥

चौपाई

जस ईसाकी कथै कहानी । तस मन्सूरकेरि गति जानी ॥ दोनोके मरनेकी बारी । प्रकटे केते चीन्ह भयकारी ॥ ऋषि सुनि जैसे करनी करही । तैसी हानि लाभमें परही ॥ ज्ञानी ध्यानी प्रभु नहिं जाना । पाय कर्मफल सुख सब माना ॥ कबहु कबहु विपिरीति देखावै । उत्तम कर्म तुच्छ फल पावै ॥ जैसो नीक नाथको लागा । तैसोई तप फल जिव मागा ॥ कुंभकरन तप करि हरि टेरी । मांगसि नींद माष षट्केरी ॥ बारह लक्ष वर्ष तप भारी । कर इबलीस हदीस पुकारी ॥

( २०२८ )

बोधसागर

. १२०

कछु नहीं ताको बस तहँ चाला। अंतकाल तेहि नकीमें डाला ॥ जीवकि वसमें जो कछु रहता। तौन सुकर्म नीच गति गहता ॥ वेशुवा बहुदिनको लेआयो। ईश्वर कृपा ताहि परछायो ॥ जबकन आनदेशमें आया। तह बल्लाम साधु यक पाया ॥ तीनसौ वर्ष कीन तप जोई। जो कछु कहै सत्य सब होई ॥ बाद येशुपासे सो ठानी। तीनसौ वर्षकी तप विनसानी ॥ जब जहि जस चाहे तस करई। जीव जतन कछु काज न सरई ॥ किनको नाथ दीन बरदाना। निज भ्राता पर हो जय माना ॥ जीत्यौं प्रभु आज्ञा अनुसार। कोई न भा दोषी हत्यारा ॥ मूसा प्रभुकी आज्ञा पावो। चलि फिर उन भूप समुझावो ॥ देय यहूदिनको सो जाना। पुनि अस वचन कहौं भगवाना ॥ मैं फिर उनको करों कठोरा। मूसा वचनसे मुख सो मोरा ॥ फिर उनहिय प्रभुकरि कठिनाई। मूसाको तब कहा बसाई ॥ को अस बली जो ताहि उबारा। प्रभु जेहि आप डुबावन हारा ॥ जैसे प्रथम भन्यकी बानी। हसन हुसेन मृत्यु इमि जानी ॥ कीन हुसेन युक्ति बहु तेरी। पहुंचे मृत्यु महि मरनकी बेरी ॥ यकदिन अस कौतुक बतलाये। महम्मद द्वै किताब ले आये ॥ यक किताब दहने कर गहई। दूजी बाम हाथमें रहई ॥ दहने हाथ किताब जो दिखावा। नाम बिहिस्तिनकोतहँलिरकवा ॥ जो किताब बायें कर ग्राही। नारख नाम लिखा तामाही ॥ प्रथमहिंते भे स्वर्गी नकीं। कुदरतकी गति जाय न तकीं ॥ प्रभु केकइकी मनि हरि लीनो। रामचंद्रको सो बन दीनो ॥ केकइको कह दूषन दीजै। हरिइच्छा किन अटक कहीजै ॥ बाबुल बुर्ज बनावन लागे। सब नर तिय तेहि उद्यम पागे ॥ ताते नहीं ईश्वर सुखपाई। सबकी बोल दियौ पटलाई ॥ बरने बेद उपनिषद साखी। देव दनुज दोऊ दल रन भाखी ॥

१२१

जीवधर्मबोध

(२०२९)

हारे असुर सुरन जय पाया । विजइन मन अभिमान समाया ॥ जब देवन कीने अभिमाना । ब्रह्मरूप तब तहँ प्रकटाना ॥ ऐसो तेजमई सो रहेऊ । कोईसुर नहिं सन्मुख है सकेऊ ॥ सब सुर अग्नि पौनको टेरी । तेहि औसर तहँ दोउ कर फेरी ॥ सब सुर अग्नि पौनसे कहेऊ । ब्रह्मरूप जो प्रकटे भैऊ ॥ हम सन्मुख है सके न ताही । तुम करि कृपा तासु दिग जाही ॥ तादिग पौनदेव जब गैऊ । ब्रह्म ताहिते पूछत भैऊ ॥ तुम हो कौन कहा तौ कर्मा । पवन देवता भाज्यौ मर्मा ॥ नाम पौन सुर मेरो होई । जो कुछ होय उडावो सोई ॥ तहां रही यक तृणकी ढेरी । ब्रह्मसो पौनको पौकहि टेरी ॥ वह ढेरीको देह उड़ाई । पौनदेवकर बल अधिकाई ॥ यक तृण तासु न सका उड़ाई । बलकरि पवनदेव थकि जाई ॥ लज्जित पौन गौन धरकीने । अग्निदेव पुनि तहँ पग दीने ॥ पूछै ब्रह्म कौन तू भाई । अग्निदेव निजु नाम सुनाई ॥ पूछै ब्रह्म कर्म तो काहा । अग्नि कहे मैं सब कुछ दाहा ॥ कहे ब्रह्म तृणढेर जलावो । अग्निदेव वह जोर लगावो ॥ तृण यक भस्म न सो करसकेऊ । जोर लगाय अग्नि तहँ थकेऊ ॥ तब लजायके अग्नि सिंधारा । ब्रह्मा सो गुप्त भयौ तेहि बारा ॥ देवी प्रकट भई तेहि काला । देवनसे कहा बचन रसाला ॥ तुम अभिमान भंजवे कारण । ब्रह्मस्वरूप कियौ निजु धारण ॥ तुमरे मन हंकार जो आया । हम असुरनको मारि हटाया ॥ तुमरो कियौ होय कछु नाहीं । हानि लाभ विधिकी बस आही ॥ सर्वसमर्थ सर्वको दाता । ताकी गतिनहिं लर्यौ विधाता ॥ सो सबहीको खेल खेलावै । वाजीगर गतिको लखि पावै ॥ सबहीको जिन गर्व प्रहारा । लखि नहिं परत अलख करतारा ॥

(२०३० )

बोधसागर

१२२

बल वीरज विद्या चतुराई । बाजीगरको खेल् बनाई ॥ तीन देव जेते औतारा । कर्मके बन्धन नाचै सारा ॥ नाचै ब्रह्मा नाचै विष्णू । नाचै शंकर नाचै जिष्णू ॥ नाचै आप निरंजन ज्ञानी । तन धरि नाचै आदि भवानी ॥ नाचै ब्रह्म रुद्र हरि नारी । पीर पयम्बर नाचै झारी ॥ सिद्ध साधु सुर नर मुनि नाचै । सतगुरु कृपा सन्त कोई बाचै ॥ अहंकार करिके अज्ञानी । चाहत हरिमाया तरि जानी ॥ एक तपीकी कहो कहानी । जो अज्ञानते तप दृढ़ ठानी ॥ सोनिज मन असकीन विचारा । तपकरि चल हरि माया पारा ॥ ऐसी अपनी देह बढ़ावो । माया लंघि ब्रह्म मिल जावो ॥ ऋद्धि सिद्धि बल तामें जागा । तप करि देह बढ़ावन लागा ॥ महादीर्घ देही जब कीने । ब्रह्मचिंतवनमें चित्त दीने ॥ बढ़ तन ब्रह्म प्रभा परशनमें । अंग उत्तंग भंग मैं छनमें ॥ ब्रह्म प्रभाको कीन जो ध्याना । ताछन बढ़ा वपुष बिनसाना ॥ महादीर्घ तन है गिर परेऊ । पुनि सो मच्छरको तन धरेऊ ॥ घासनमें सो कियौ बसेरा । फिरत एक मृग वनमें हेरा ॥ तब ताको मृग लात जो लागा । ताते सो मच्छरतन त्यागा ॥ सुरति मसक मृग माह समाई । मच्छरतन तजि मृगतन पाई ॥ तेहि मृग मारन चले शिकारी । आय ताहिपर शस्त्र प्रहारी ॥ जब मृग निज तन त्यागकराई । बधिकमें ताकी सुरति समाई ॥ ताते बधिक भयौ मृग सोई । एक दिन वनमें विचरत होई ॥ विचरत बनहि मिले मुनि एका । ज्ञान दिये तेहि सहित विवेका ॥ मुनि उपदेश बधिक जो पाई । बहुरि सोभक्ति भाव मनलाई ॥ करि हंकार कर्म जो करहीं । तिनको कबहु न पूरा परहीं ॥

१२३

जीवधर्मबोध

( २०३१ )

दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय । बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥

चौपाई

वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥ वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥ महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥ त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥ जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥ मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥ जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥ मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥ कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥ जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥ जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥

रामचंद्र वचन

दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥

चौपाई

भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥ सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥ सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥ नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥ विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥ जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥

( २०३२ )

बोधसागर

१२४

सोरठा-पुण्य पाप मोहि नाहिं, निलैँपो निरद्वंद मैं । बंधा बंधन माहिं, विधि निषेधको ज्ञान गहिं ॥

चौपाई

मैं यक भर्म पूतसा ठाढ़ा । मेरे हृदय मान अति बाढ़ा ॥ मेरे विद्या गुण चतुराई । मैं सुन्दर छबि रूप निकार्ई ॥ मैं कुलीन उत्तम सब लायक । मेरो कर्म सकल मनभायक ॥ पुण्यते हर्ष पाप डर कापे । कर्म अकर्म आप शिर थापे ॥ जौजिव विधिनिषेध नहिं जानत । तौ कछु कर्म धर्म नहिं ठानत ॥ जानि बूझि करि है जो पापा । निश्चय ताहि नर्कदुःख व्यापा ॥ ऐसो मूढ कौन जगमाहीं । खरा खोट जो जानत नाहीं ॥ जो कोइ पुण्य पाप नहिं जाना । शिशुसमान निदौष बखाना ॥ जबते आदमको भो ज्ञाना । अहं भोगता करता जाना ॥ ॥ तबते परा कालको फांसा । पुण्यपापको व्यौरा भासा ॥ षटदरशन आतमको झगरे । न्यारे न्यारे मारग डगरे ॥ पीर पयंबरको मत न्यारा । एक विरुद्ध दुतिये व्यौहारा ॥ करतागति जो कोई लखिपावत । तौ काहेको झगर मचावत ॥ जिमि अंधरनमिसि चीन्हा हाथी । एक समान तासुके साथी ॥ मैं नहिं तू नहिं वह नहीं कोई । कहि नहिं जात ख्याल क्या होई ॥ जो मैं ही तो मोहि किन बंधा । पायौ ज्ञान गुरुकी संधा ॥ आप गुरु अरु आपै चेला । कहि न जात कुदरतको खेला ॥ दुतिया बिन कौ ज्ञान गहावै । ज्ञानते दुतिया नजर न आवै ॥ ज्ञान पाय दुतिया नहिं माना । दुतिया धौ मोहि माह डुराना ॥ अमीकुंडमें चिऊँटी डूबी । स्वाद पाय जान्यौ कछु खूबी ॥ कुंडको अंत न पावै कबहुँ । कोटिन गोता मारे जबहुँ ॥ अस विज्ञान गम्यको गहई । ताको पारावार न लहई ॥

१२५

जीवधर्मबोध

( २०३३ )

आपै भीतर बाहर बोले । बिरला साधु सो भेद टटोले ॥ देय दिलवै मागे जोई । सकल कर्मको करता सोई ॥ आपै देय आप नटि जाई । आपै चले आप हटि जाई ॥ सिद्ध साधु चकित है थकही । सतासत न कछु कही सकही ॥ स्वप्न अवस्था जब जिव परई । अपनी बस कछु कर्म न करई ॥ स्वप्नदशामें जाने सोई । यह सब कर्म आपनो होई ॥ जब जाग्यौ तब न्याय निबेरा । मेरो कर्म न सपने केरा ॥ चार अवस्थाके सब कर्मा । ऐसेहि जानि लेहु जिव भर्मा ॥ चहुँ अवस्था मिथ्या राचा । ताको कर्म होय कहँ साचा ॥ ऐसेहि ज्ञान अवस्था माही । सर्वकर्म मिथ्या दरसाही ॥ मैं नहिँ मैं मिथ्या अभिमानी । भर्मेते कर्म आपनो जानी ॥ संत सुजान यह मनहि विचारी । सब मद मान दूर करि डारी ॥ अहंकार है नर्क निसानी । भक्ति गरीबी जीव सुख दानी ॥

दोहा—जानि बूझि जो जड़ भया, आपको जानै नीच । सोई सबसे श्रेष्ठ है, ज्ञानगम्य तेहि बीच ॥ जाना नहिँ बूझा नहिँ, जो जड़ दशा गहाय । अज्ञानी मूरख सोई, सो न भक्तिपद पाय ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

दासको दीनता जब आवै ।

सो पद देव दास अपनेको शिव ब्रह्मा नहि पावे ॥ औरनको पूरा करि जाने आपको ओछ कहावे ।

अवधूतन ते सत कहत हो सो मेरे मन भावै ॥ एकै ब्रह्म सकल घट देखे दुबिधा दूर बहावे । इन पाँचोंसे तोरि सनेहा जब गोविंद गुण गावे ॥

( २०३४ )

बोधसागर

१२६

होय अधीन प्रेम लौलावै कुल अभिमान मिटावै । सहज शून्यमें रहे समार्ई पठिगुण सब बिसरावै ॥ गुरुकी दया साधुकी संगती भावभक्ति चितलावै । कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन परमपद पावै ॥ कौन हमारे आये केशव क्यों न हमारे आये । पट रस व्यंजन छोटि रसोई साग विदुरघर खाये ॥ जहँ अभिमान तहाँ हम नहीं वह व्यंजन विष लागे । सोई मुनिजन पूरा कहिये अभिमानीको त्यागे ॥ जातिहीन जाके कुल नहीं है दासीको जायौ । ताकीट परिख्या तुम जायके बैठे कहा बड़ापन पायौ ॥ सत्यासत्यवचन कहो दुरयोधन सुनिले बात हमारी । विदुर हमारे प्रानसो प्यारे तुम विषिया बेकारी ॥ पुरातन कथा तुम्हारी हरिजी वनमें छाक मँगाई । ग्वालनके संग भोजन करते सो मति तुममें आई ॥ प्रेम प्रीतिके हम हैं भूखे अभिमानी नहीं भावै । कहैं कबीर साधुकी महिमा हरि अपने मुख गावै ॥

रामचंद्रवचन-चौपाई

सबहि मानप्रद आप अमानी । भरथ प्रानसम ते मम प्रानी ॥ वेद प्रमान आदि ओंकारा । सो करता सोई श्रुति सारा ॥ सो ओंकारको अर्थ बखानो । दीनता और गरीबी जानो ॥ जहँ दीनता गरीबी बसई । सबगुण ज्ञान ताहिमें लसई ॥ तौरे तो इञ्जील सोयी नय । आहि दीनता ज्ञान गुणनमय ॥ पुनि जन्बूर कहे सो हेता । दीनको प्रभु सोभा गति देता ॥ पुनि कुरानको सोई मत हेरी । ऊँच बोल है गर्दभ केरी ॥ गदहा पर ईसा चढ़ि चाले । सो दीनता धर्म प्रतिपाले ॥

१२७

जीवधर्मबोध

( २०३५ )

धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥ जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥ लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥ भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥ पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥ जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥ भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥ आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥ भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥ पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥ बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥ आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥ अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥ खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥ तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥ ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥ मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥ जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥ चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥ करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥ ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥ बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥ सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥ कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥ कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥

( २०३६ )

बोधसागर

१२८

कह नारद ब्रह्मा सुत होई । कहब पुरा कैवर्तक जोई ॥ कहु सुख देवगर्भके योगी । कह नृप जनकविषयरस भोगी ॥ कह मूसा गुण ज्ञान निधाना । कह इबलीस दोजखी जाना ॥ बिनदी मतान जिव कोई तरिहै । करि सुकर्म भवसागर परिहै ॥

नानक शाह वचन

दोहा-नानक नन्हे हो रहो, जैसी नन्ही दूब । घास पात जरि जाहिगी, दूबखूबकी खूब ॥

सेख फरीद वचन

दोहा-फरीदा ऐसा हो रहो, जैसा करकख मंसीत । आठोपहरलताडिये, तेरीरब्बनालरह प्रीत ॥ सोरठा-धर्मसार यह जान, भक्ति दीन ता दिल गहे । तजि दीजै मदमान, होयपरम कल्यान तब ॥ तनमनधन गुरुअर्प, करनीकर गुरुद्वारनिज । बहुरि काल नहिं दर्प, प्रेमभाव पद पूजिये ॥

इति श्रीधर्मसार

अथ सर्वधर्मएकता वर्णन-चौपाई

एकै धर्म सकल संसारा । भिन्न भेदते दरसै न्यारा ॥ विषय अमृतमें दियौ मिलाई । ताते जिवकी सुधि विसराई ॥ सप्त पंथ तजि कुपुर कमावै । न्यारी राह जीवको भावै ॥ कहु तीरथ व्रत मूरति बताया । कहुमदमास हरामको खाया ॥ जारी जोर जुलुम कहु देखो । यक अछहको न्यारो लेखो ॥ उज्वल करनी सब देखलाई । तामें कहुक हराम मिलाई ॥ जबलों भोगकिआसा रहई । तबलों जिव हराम गतिगहई ॥ भोगकि इच्छा दिलसे त्यागे । तब जिव सत्य पंथमें लागे ॥ विषय विकारते मुक्ति न पावै । सतगुरु त्याग औरको ध्यावै ॥

१२९

जीवधर्मबोध

( २०३७ )

परम पुरुष पदको जब त्यागा । तब हराम कारीमें लागा ॥ जीव गँवायो ज्ञान कि थेली । तजि शुभकर्म करै बदफैली ॥ जौन विकार जाहि मत माहीं । तजि सब जिव निर्मल है जाहीं ॥ निज औगुणजब जिव पहिचाना । भर्म छाँडि शुभ धर्महि जाना ॥ हृदयमें जब उगे विवेका । तब सब जिवके मत हो एका ॥ सत्य पुरुषकी भक्ति जो गहेऊ । तजि विकार तब अमरसो भैऊ ॥

इति सर्वधर्मएकता

अथ ब्रह्माण्ड और पिंडकी एकता—चौपाई

यह ब्रह्मांड सकल है पानी । तामें अद्भुत ख्याल उपानी ॥ अण्ड पिंड दो उदधि अपारा । इन्द्रजाल तामें विस्तारा ॥ रच्यौ ख्याल यह बाजीगरको । अन्न लहेको भवसागरको ॥ अण्डाकार पिंड ब्रह्माण्ड । तामें सकल द्रौप नौखण्डा ॥ यह समुद्र है अगम अगाहा । भरमत जीव न पावे थाहा ॥ चौरासी लख गोता खाही । बूड़े उछले पार न जाही ॥ जिमि ब्रह्मांड समुद्र बखानी । तिमियह पिंडबून्दयकजानी ॥ सिन्धु बून्द दोनों यकरूपा । कहिनजाय अति अकथअनूपा ॥ सिन्धुमें बून्द बून्दमें सागर । जाने विनापन्यौ जगझागर ॥ जो कछु रचना सिन्धुमें परखो । ज्योंकीत्योंसोई बुंदमें निरखो ॥ वारिद बुंद विचार विलोका । दोनों द्वैधौ दोनों एका ॥ दोनों एक तुल्य है चोखे । विषय विकार दोहुनको पोखे ॥ इंद्रिन सहित दोहु एक सारा । दोहुमें एकै खेल पसारा ॥ ताते प्रथम पिंड गति जानो । पुनि ब्रह्माण्डको लेखा ठानो ॥ पिंड खेल जबलों नहीं लहई । अंडलेख तबलों कह कहई ॥ पहिले पिंड आपनो तरना । पुनि ब्रह्मांडके पार उतरना ॥ जाते पिंड तरो नहीं जाई । सो ब्रह्मा पार कह पाई ॥

( २०३८ )

बोधसागर

१३०

जबलों देह सत्यकरि जानी । तबलों पिण्ड तरे नहिं प्रानी ॥ आदिमें अण्ड रूप यक रहेऊ । हिरण्यगर्भ ताहीको कहेऊ ॥ हिरण्यगर्भ निज मनहि विचारा । द्रन्द्व खेल तेहि काल सँवारा ॥ हिरण्यगर्भ प्रजापति मेला । ताते खिला जत्तको खेला ॥ फूटा अंड भयो द्वै धारा । ताते द्रन्द्व जत्त हितकारा ॥ द्रन्द्वमता संसारहि मेले । नर नारी दोउ जगमें खेले ॥ दोनों मिले होय तब रचना । सकल स्वरूप ताहिसे खचना ॥ जिहि अवसर जिव भर्महि भंडा । जो कछु पिण्ड सोह ब्रह्मण्डा ॥ आपै लखे लखो सब जाई । आपहिमें सब सृष्टि समाई ॥ माया ब्रह्म मेल जब होई । यह संसार खेल तब होई ॥ माया दीख ब्रह्म नहिं दरसै । शून्य स्वरूप ताहिको षरसै ॥ बिंदु रुधिर दूनों हैं पानी । अंड पिंड रचनाको खानी ॥ बिंदु पिता लोहू है माता । श्वेत अरुण कहिये द्वै बाता ॥ यकभो द्रन्द्व द्रन्द्व जब टूटे । हैं अनन्त सब जगमें फूटे ॥ रुधिरसे तीन धातु प्रकटानी । चाम मासु अरु रुधिर बखानी ॥ तीन धातु नर विन्दुसे होई । हाड अरु गूद विन्द कह सोई ॥ माता तीन पिता मलतीनी । ताते जगकी रचना कीनी ॥ माताको सब कोई लखि पावै । पिता काहुकी नजर न आवै ॥ मातामें रह पिता छपाई । ताते कोई देखि नहिं पाई ॥ माता जबहि पिता बतलावै । तब कोई खबर तासुको पावै ॥ माताको अभाव जब होई । पिता दरस तब कर सब कोई ॥ यह दृष्टांत मैं प्रकट बखाना । मायामें हमि ब्रह्म लुकाना ॥ चाम मास लोहू है बाहर । हाड अरु गूद विन्द है भीतर ॥ माता जैसे पिता छपावै । माया ऐसे ब्रह्म दुरावै ॥

१३१

जीवधर्मबोध

( २०३९ )

माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥ पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥ पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥ पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥ अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥ ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥ काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥ भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥ वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥ चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥ मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥ नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥ इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥ पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥ तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥ इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥ दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥ बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥ मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥ मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥ पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥ हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥ प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥ पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥ दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥

( २०४० )

बोधसागर

१३२

हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥ दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥ बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥ औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥ दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥ गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥ शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥ सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥ होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥ तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥ दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥ इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥ कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥ देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥ अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥ मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥ दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥ दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥ बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥ मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥ शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥ शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥ रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥ महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥ आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥ खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥

१३३

जीवधर्मबोध

( २०४१ )

जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥ जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥ दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद। नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥

नानक वचन

तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥ कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥ शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥ हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥

नानक वचन

चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥ प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥

जिंदा वचन

आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥ साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥ नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥ परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥ चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥ नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥

नानक वचन

तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥ सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥

( २०४२ )

बांधसागर

१३४

खार मीठ जल सब पहिचानो । नौसौ नदी पिंडमें मानो ॥ श्वासा नदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रस भाखा ॥ ये समुद्रमें जाय समानो । है गंडार नहीं त्रिसानो ॥

नानक वचन

सात समुद्रकी लहर बखानो । इनकी लहर कौन विधि मानो ॥

जिंदा वचन

काम अरु क्रोध लोभ हंकारा । मनमायाकी लहर अपारा ॥ अग्नि पौन पानी प्रचण्डा । पांच तत्त्व बतैं नौ खण्डा ॥

नानक वचन

बाही लहर हीरा अरु मोती । यामें कहा निकसि है सोती ॥ सभी भेद मोहिं कहु गुरुदेवा । नहिं छोड़ो अब तुमरी सेवा ॥

जिंदा वचन

जब गुरु मिलै भुङ्ग सम रंगा । ब्रह्मज्ञान उपजै सतसंगा ॥ सुमिरन भजन होय परकाशा । अनहद ध्यान पुरुषकी आशा ॥ अर्श गैवमें ध्यान लगावै । तवासिंधु थाह कोइ पावै ॥ जाय हंस तहैं डुबकी मारा । ले निकसे तब वस्तु अपारा ॥ हीरा लाल नाम परकाशा । शब्द सुरति हंसाको बासा ॥ कथा समाज निकसिहै ज्ञाना । सो हीरा मणि माणिक जाना ॥

नानक वचन

खार मीठ जल इहां अपारा । उहां कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥

जिंदा वचन

नयन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानौ जलधारी ॥ खार मीठ जल सभी भरा है । जो ब्रह्मांड सो पिंड कहा है ॥

नानक वचन

इहां है काठ लोहकी नौका । कहो स्वामी व्यौहार वहांका ॥

१३५

जीवधर्मबोध

( २०४३ )

जिंदा वचन

नाम पुरुष नौका इहां भाई । खेवट संत गुरु संत मिलाई ॥ पुरुष शब्द सुमिरो लौ लाई । पुरुष प्रताप उतारि चल भाई ॥

नानक वचन

धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमरभेद भाषी निज बानी ॥

साखी-तिलघोटत तारी लगी, दिलदरियाके तीर ।

नानककी संशय मिटी, जो सतगुरु मिले कबीर ॥

चौपाई

बहुरि अर्ब यूनानके ज्ञानी । पिंड अण्ड सम तूल बखानी ॥ जो सबही ब्रह्मांडमें देखो । पिंड केर सोई है लेखो ॥ अस्थि पहाड़ है मेघ पसीना । शिर नभ इंद्री कर्म प्रवीना ॥ सुर नर सुनि ग्रंथव अरु देवा । पिंड अण्डमें एकै भेवा ॥ सकल भांतिके पशु खग नाना । कर्म करंत बसै परधाना ॥ भोजन पावक पौरुष जोई । सोई रसोईदार कहोई ॥ जो बल अंतमें भोजन धरई । गन्धी नामक तासुको परई ॥ जो बल रुधिरको श्वेत बनावै । नारि कुचनमें दूध कहावै ॥ अण्डकोष नर बीरज धोवै । धोबी नाम तासुको होवै ॥ भोजन अंगमें बाटनहारा । नाम बंधानी तासु उचारा ॥ जल जो पसीना रूप निकारी । सो कहिये सक्का पनिहारी ॥ जो भोजन मल बाहर डारे । नाम हलाहलखोर सो धारे ॥ बात पित्त जो अन्तर गहई । सोई न्याय करंता कहई ॥ यह विधि सब पशुखगतनमाही । कोध स्वरूपी बीग सो आही ॥ अंड पिंडकी अकथ कहानी । मैं कछु सूक्ष्म लिखा प्रमानी ॥ दोहा-बूँद समाना सिंधुमें, यह जाने सब कोय । सिंधु समाना बूँदमें, जाने बिरला सोय ॥

( २०४४ )

बोधसागर

१३६

कुंडलिया

जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय। मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥ भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी। टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥

इति ब्रह्मांड पिंड

अथ सर्वदेशभाषाकी एकता

दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि। भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥

चौपाई

संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥ संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥ वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥ एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा। मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥ गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥ संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥ प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥ आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥ अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥ बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥ एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥ सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥ बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥ एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥ थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥ वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥

१३७

जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥ जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥ पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥ पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥ तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥ तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥ त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥ प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥ य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥ खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥ संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥ बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥ जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥ वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥ आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥ लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥ सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥