भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०३२ )

बोधसागर

१२४

सोरठा-पुण्य पाप मोहि नाहिं, निलैँपो निरद्वंद मैं । बंधा बंधन माहिं, विधि निषेधको ज्ञान गहिं ॥

चौपाई

मैं यक भर्म पूतसा ठाढ़ा । मेरे हृदय मान अति बाढ़ा ॥ मेरे विद्या गुण चतुराई । मैं सुन्दर छबि रूप निकार्ई ॥ मैं कुलीन उत्तम सब लायक । मेरो कर्म सकल मनभायक ॥ पुण्यते हर्ष पाप डर कापे । कर्म अकर्म आप शिर थापे ॥ जौजिव विधिनिषेध नहिं जानत । तौ कछु कर्म धर्म नहिं ठानत ॥ जानि बूझि करि है जो पापा । निश्चय ताहि नर्कदुःख व्यापा ॥ ऐसो मूढ कौन जगमाहीं । खरा खोट जो जानत नाहीं ॥ जो कोइ पुण्य पाप नहिं जाना । शिशुसमान निदौष बखाना ॥ जबते आदमको भो ज्ञाना । अहं भोगता करता जाना ॥ ॥ तबते परा कालको फांसा । पुण्यपापको व्यौरा भासा ॥ षटदरशन आतमको झगरे । न्यारे न्यारे मारग डगरे ॥ पीर पयंबरको मत न्यारा । एक विरुद्ध दुतिये व्यौहारा ॥ करतागति जो कोई लखिपावत । तौ काहेको झगर मचावत ॥ जिमि अंधरनमिसि चीन्हा हाथी । एक समान तासुके साथी ॥ मैं नहिं तू नहिं वह नहीं कोई । कहि नहिं जात ख्याल क्या होई ॥ जो मैं ही तो मोहि किन बंधा । पायौ ज्ञान गुरुकी संधा ॥ आप गुरु अरु आपै चेला । कहि न जात कुदरतको खेला ॥ दुतिया बिन कौ ज्ञान गहावै । ज्ञानते दुतिया नजर न आवै ॥ ज्ञान पाय दुतिया नहिं माना । दुतिया धौ मोहि माह डुराना ॥ अमीकुंडमें चिऊँटी डूबी । स्वाद पाय जान्यौ कछु खूबी ॥ कुंडको अंत न पावै कबहुँ । कोटिन गोता मारे जबहुँ ॥ अस विज्ञान गम्यको गहई । ताको पारावार न लहई ॥