कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०३१ )
दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय । बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥
चौपाई
वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥ वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥ महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥ त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥ जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥ मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥ जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥ मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥ कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥ जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥ जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥
रामचंद्र वचन
दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥
चौपाई
भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥ सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥ सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥ नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥ विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥ जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥