कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(२०३० )
बोधसागर
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बल वीरज विद्या चतुराई । बाजीगरको खेल् बनाई ॥ तीन देव जेते औतारा । कर्मके बन्धन नाचै सारा ॥ नाचै ब्रह्मा नाचै विष्णू । नाचै शंकर नाचै जिष्णू ॥ नाचै आप निरंजन ज्ञानी । तन धरि नाचै आदि भवानी ॥ नाचै ब्रह्म रुद्र हरि नारी । पीर पयम्बर नाचै झारी ॥ सिद्ध साधु सुर नर मुनि नाचै । सतगुरु कृपा सन्त कोई बाचै ॥ अहंकार करिके अज्ञानी । चाहत हरिमाया तरि जानी ॥ एक तपीकी कहो कहानी । जो अज्ञानते तप दृढ़ ठानी ॥ सोनिज मन असकीन विचारा । तपकरि चल हरि माया पारा ॥ ऐसी अपनी देह बढ़ावो । माया लंघि ब्रह्म मिल जावो ॥ ऋद्धि सिद्धि बल तामें जागा । तप करि देह बढ़ावन लागा ॥ महादीर्घ देही जब कीने । ब्रह्मचिंतवनमें चित्त दीने ॥ बढ़ तन ब्रह्म प्रभा परशनमें । अंग उत्तंग भंग मैं छनमें ॥ ब्रह्म प्रभाको कीन जो ध्याना । ताछन बढ़ा वपुष बिनसाना ॥ महादीर्घ तन है गिर परेऊ । पुनि सो मच्छरको तन धरेऊ ॥ घासनमें सो कियौ बसेरा । फिरत एक मृग वनमें हेरा ॥ तब ताको मृग लात जो लागा । ताते सो मच्छरतन त्यागा ॥ सुरति मसक मृग माह समाई । मच्छरतन तजि मृगतन पाई ॥ तेहि मृग मारन चले शिकारी । आय ताहिपर शस्त्र प्रहारी ॥ जब मृग निज तन त्यागकराई । बधिकमें ताकी सुरति समाई ॥ ताते बधिक भयौ मृग सोई । एक दिन वनमें विचरत होई ॥ विचरत बनहि मिले मुनि एका । ज्ञान दिये तेहि सहित विवेका ॥ मुनि उपदेश बधिक जो पाई । बहुरि सोभक्ति भाव मनलाई ॥ करि हंकार कर्म जो करहीं । तिनको कबहु न पूरा परहीं ॥