भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( २०३३ )

आपै भीतर बाहर बोले । बिरला साधु सो भेद टटोले ॥ देय दिलवै मागे जोई । सकल कर्मको करता सोई ॥ आपै देय आप नटि जाई । आपै चले आप हटि जाई ॥ सिद्ध साधु चकित है थकही । सतासत न कछु कही सकही ॥ स्वप्न अवस्था जब जिव परई । अपनी बस कछु कर्म न करई ॥ स्वप्नदशामें जाने सोई । यह सब कर्म आपनो होई ॥ जब जाग्यौ तब न्याय निबेरा । मेरो कर्म न सपने केरा ॥ चार अवस्थाके सब कर्मा । ऐसेहि जानि लेहु जिव भर्मा ॥ चहुँ अवस्था मिथ्या राचा । ताको कर्म होय कहँ साचा ॥ ऐसेहि ज्ञान अवस्था माही । सर्वकर्म मिथ्या दरसाही ॥ मैं नहिँ मैं मिथ्या अभिमानी । भर्मेते कर्म आपनो जानी ॥ संत सुजान यह मनहि विचारी । सब मद मान दूर करि डारी ॥ अहंकार है नर्क निसानी । भक्ति गरीबी जीव सुख दानी ॥

दोहा—जानि बूझि जो जड़ भया, आपको जानै नीच । सोई सबसे श्रेष्ठ है, ज्ञानगम्य तेहि बीच ॥ जाना नहिँ बूझा नहिँ, जो जड़ दशा गहाय । अज्ञानी मूरख सोई, सो न भक्तिपद पाय ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

दासको दीनता जब आवै ।

सो पद देव दास अपनेको शिव ब्रह्मा नहि पावे ॥ औरनको पूरा करि जाने आपको ओछ कहावे ।

अवधूतन ते सत कहत हो सो मेरे मन भावै ॥ एकै ब्रह्म सकल घट देखे दुबिधा दूर बहावे । इन पाँचोंसे तोरि सनेहा जब गोविंद गुण गावे ॥