भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥ जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥ पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥ पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥ तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥ तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥ त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥ प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥ य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥ खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥ संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥ बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥ जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥ वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥ आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥ लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥ सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥