कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥ इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥ हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥ संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥ अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥ आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥ अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥ मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥ अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥ पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥ पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥ सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥ दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥ सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥ शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥ भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥ अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥ जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥ संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥ संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥ अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥ चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥ पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥ मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥ और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥ अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥