कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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कुंडलिया
जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय। मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥ भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी। टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥
इति ब्रह्मांड पिंड
अथ सर्वदेशभाषाकी एकता
दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि। भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥
चौपाई
संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥ संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥ वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥ एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा। मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥ गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥ संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥ प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥ आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥ अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥ बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥ एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥ सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥ बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥ एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥ थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥ वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥