भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( २०३७ )

परम पुरुष पदको जब त्यागा । तब हराम कारीमें लागा ॥ जीव गँवायो ज्ञान कि थेली । तजि शुभकर्म करै बदफैली ॥ जौन विकार जाहि मत माहीं । तजि सब जिव निर्मल है जाहीं ॥ निज औगुणजब जिव पहिचाना । भर्म छाँडि शुभ धर्महि जाना ॥ हृदयमें जब उगे विवेका । तब सब जिवके मत हो एका ॥ सत्य पुरुषकी भक्ति जो गहेऊ । तजि विकार तब अमरसो भैऊ ॥

इति सर्वधर्मएकता

अथ ब्रह्माण्ड और पिंडकी एकता—चौपाई

यह ब्रह्मांड सकल है पानी । तामें अद्भुत ख्याल उपानी ॥ अण्ड पिंड दो उदधि अपारा । इन्द्रजाल तामें विस्तारा ॥ रच्यौ ख्याल यह बाजीगरको । अन्न लहेको भवसागरको ॥ अण्डाकार पिंड ब्रह्माण्ड । तामें सकल द्रौप नौखण्डा ॥ यह समुद्र है अगम अगाहा । भरमत जीव न पावे थाहा ॥ चौरासी लख गोता खाही । बूड़े उछले पार न जाही ॥ जिमि ब्रह्मांड समुद्र बखानी । तिमियह पिंडबून्दयकजानी ॥ सिन्धु बून्द दोनों यकरूपा । कहिनजाय अति अकथअनूपा ॥ सिन्धुमें बून्द बून्दमें सागर । जाने विनापन्यौ जगझागर ॥ जो कछु रचना सिन्धुमें परखो । ज्योंकीत्योंसोई बुंदमें निरखो ॥ वारिद बुंद विचार विलोका । दोनों द्वैधौ दोनों एका ॥ दोनों एक तुल्य है चोखे । विषय विकार दोहुनको पोखे ॥ इंद्रिन सहित दोहु एक सारा । दोहुमें एकै खेल पसारा ॥ ताते प्रथम पिंड गति जानो । पुनि ब्रह्माण्डको लेखा ठानो ॥ पिंड खेल जबलों नहीं लहई । अंडलेख तबलों कह कहई ॥ पहिले पिंड आपनो तरना । पुनि ब्रह्मांडके पार उतरना ॥ जाते पिंड तरो नहीं जाई । सो ब्रह्मा पार कह पाई ॥