भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०३६ )

बोधसागर

१२८

कह नारद ब्रह्मा सुत होई । कहब पुरा कैवर्तक जोई ॥ कहु सुख देवगर्भके योगी । कह नृप जनकविषयरस भोगी ॥ कह मूसा गुण ज्ञान निधाना । कह इबलीस दोजखी जाना ॥ बिनदी मतान जिव कोई तरिहै । करि सुकर्म भवसागर परिहै ॥

नानक शाह वचन

दोहा-नानक नन्हे हो रहो, जैसी नन्ही दूब । घास पात जरि जाहिगी, दूबखूबकी खूब ॥

सेख फरीद वचन

दोहा-फरीदा ऐसा हो रहो, जैसा करकख मंसीत । आठोपहरलताडिये, तेरीरब्बनालरह प्रीत ॥ सोरठा-धर्मसार यह जान, भक्ति दीन ता दिल गहे । तजि दीजै मदमान, होयपरम कल्यान तब ॥ तनमनधन गुरुअर्प, करनीकर गुरुद्वारनिज । बहुरि काल नहिं दर्प, प्रेमभाव पद पूजिये ॥

इति श्रीधर्मसार

अथ सर्वधर्मएकता वर्णन-चौपाई

एकै धर्म सकल संसारा । भिन्न भेदते दरसै न्यारा ॥ विषय अमृतमें दियौ मिलाई । ताते जिवकी सुधि विसराई ॥ सप्त पंथ तजि कुपुर कमावै । न्यारी राह जीवको भावै ॥ कहु तीरथ व्रत मूरति बताया । कहुमदमास हरामको खाया ॥ जारी जोर जुलुम कहु देखो । यक अछहको न्यारो लेखो ॥ उज्वल करनी सब देखलाई । तामें कहुक हराम मिलाई ॥ जबलों भोगकिआसा रहई । तबलों जिव हराम गतिगहई ॥ भोगकि इच्छा दिलसे त्यागे । तब जिव सत्य पंथमें लागे ॥ विषय विकारते मुक्ति न पावै । सतगुरु त्याग औरको ध्यावै ॥