कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०३५ )
धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥ जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥ लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥ भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥ पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥ जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥ भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥ आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥ भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥ पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥ बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥ आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥ अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥ खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥ तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥ ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥ मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥ जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥ चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥ करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥ ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥ बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥ सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥ कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥ कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥