भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०४० )

बोधसागर

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हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥ दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥ बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥ औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥ दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥ गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥ शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥ सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥ होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥ तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥ दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥ इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥ कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥ देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥ अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥ मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥ दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥ दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥ बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥ मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥ शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥ शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥ रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥ महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥ आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥ खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥