भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( २०३९ )

माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥ पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥ पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥ पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥ अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥ ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥ काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥ भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥ वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥ चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥ मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥ नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥ इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥ पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥ तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥ इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥ दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥ बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥ मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥ मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥ पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥ हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥ प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥ पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥ दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥

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