कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २०१२ )
बीधसागर
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महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥ पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥ दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥ धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥ ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥ तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥ जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥ एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥ एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥ राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥ ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥ यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥ क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥ जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥ यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥ यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥ ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥ अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥ वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥ एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥ ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥ सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥ मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥ और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥ इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥