भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २०१२ )

बीधसागर

१०४

महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥ पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥ दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥ धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥ ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥ तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥ जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥ एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥ एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥ राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥ ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥ यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥ क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥ जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥ यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥ यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥ ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥ अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥ वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥ एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥ ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥ सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥ मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥ और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥ इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥

१०५

जीवधर्मबोध

( २०१३ )

अग्नि पौन आदिक जो कहाऊ । इन्द्रके दरवारिनको नाऊ ॥ इन्द्रहि रणमें रावन जीता । बंधन डारिके देतेहि कीता ॥ नृपको जब बंधनमें डारा । मन्त्रिनको कर चेरवा डारा ॥ नीचटहल दरबारिन गहेऊ । अग्नि पौन रावन बस भैऊ ॥ अग्नि पौन आदिक जो कहेऊ । सो सब नाम मनुषको रहेऊ ॥ सुरपति नहीं बंधनमें आवै । मिथ्याती सब कूट बतावै ॥ छनमें इन्द्र प्रलय जग करई । ताहि कौन बंधनमें धरई ॥ प्रलय करे फिर जग प्रकटावै । सो किमि रावनकी बस आवै ॥ ऐसो अग्नि पौन बलकारा । छनमें प्रलय करे संसारा ॥ मिथ्याती सब कूठ वर्णके । अग्नि पौन रह बस रावनके ॥ ब्रह्मन क्षत्री होय लराई । क्षत्री द्विजनको मारि हटाई ॥ परशुराम तब द्विजकुल होई । परमशत्रु क्षत्रीको सोई ॥ ताते अनगिन क्षत्री मारा । तब सुभूमि लीवो औतारा ॥ क्षत्री चक्रवर्त पदधारा । पशुरामको ताने मारा ॥ हनिवर द्वीपकौ राजा जोई । हनोमानको नाना सोई ॥ हनोमान ननिओ रे गैऊ । आदर मान तहां बड़ भैऊ ॥ हनिवर द्वीपमें आदर पाई । ताते हनोमान कहलाई ॥ बानरवंशी क्षत्री सोई । हनोमान विद्याधर होई ॥ रूप अनूप महा छबि जाको । कामदेव औतार है ताको ॥ बज्र अंग बल बरनि न जाई । गुणगणशील जासो अधिकार्ई ॥ राजा पौन जय कहलाये । हनुमान है ताके जाये ॥ पौनते मनुष न जन्मै कोई । यह कपोलकलपित सब होई ॥ हनोमानको बानर भाषा । पीठके ऊपर पूछ सो राखा ॥ कूठ कथा मिथ्याती कहई । नर बानर किमि संगत गहई ॥ बालि सुकंठ आदि नृप जेते । बानरवंशके क्षत्री तेते ॥

( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥ चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥ ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥ चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥ कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥ देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥ जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥ अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥ यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥ ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय । परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥ सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥ ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥ नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥ निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥ कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥ जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥ स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥ सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥ इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥

१०७

जीवधर्मबोध

( २०१५ )

मान सरोवर हंस निवासा । बकुला तहां करहि नहिं वासा ॥ भोजन भैक मीन जिन केरा । तिनको डाबर माह बसेरा ॥ जो हरिनाम खुगे शुचि मोती । बसे मानसर तिनके गोती ॥ सब जीवनके जो हितकारी । परमारथमें तन धन वारी ॥ स्वसंवेदकी आस गहाई । अन्य नती बहु रीति चलाई ॥ निर्मल जल अकाशते आवै । भूमि परत डाबर है जावै ॥ तिमि सब स्वसंवेदते वानी । भिन्न भाव धरिजग प्रकटानी ॥ सत्यपंथके गृही विरागी । परम पुरुषकी सेवा लागी ॥ जुरे समाज जहांयक तीरा । ढोल मृदंग मधुर मखीरा ॥ बजै झांझ खँजरी करताला । बाजन विविधि प्रकार सुताला ॥ सत्य कबीरको नाद उठावै । रहसि-रहसि प्रभुको गुण गावै ॥ सन्त गुरुकी सेवा माहीं । इन्है समान और कोउ नाहीं ॥ परमधर्म गुरुसन्तकी सेवा । ताते मिले पुरातन देवा ॥ धरे जेते धन द्रव्य शुभागे । सब गुरु सन्त सेवमें लागे ॥ गृही होय गुरु साधू सेवै । वैरागी तपमें चित देवै ॥ परम उदार चित जिन केरा । सत्यलोकमें तासु बसेरा ॥

इति स्वसंवेद

अथ स्मार्तमत व्यौरा वर्णन

दोहा—सतगुण रजगुण धर्ममय, स्मृती मत संन्यास ।

उत्तम मध्य कनिष्ठ विधि, कौजै कथा प्रकाश ॥

चौपाई

उत्तम मध्यम जो संन्यासा । सतगुण मयी ताही परकाशा ॥ दीगम्बर दंडी संन्यासी । दोनों धर्म सतो गुण राशी ॥ अब कनिष्ठ संन्यास कहीजै । जब सत रज मिश्रित चित दीजै ॥ कोइ कोइ दुराचार इन माही । मद्य मांसको भोग कराही ॥

( २०१६ )

बोधसागर

१०८

योगी अरु संन्यासी दोई । एक स्वरूप जानिये सोई ॥ इति स्मार्तभत

अथ मीमांसाधर्म वर्णन—चौपाई

रजगुण ब्रह्मा रूप कहावै । धर्म मिमांसा जक्त चलावै ॥ कर्मते श्रेष्ठ और नहिं कोई । कर्महिंते सब रचना होई ॥

इति मीमांसा

अथ मूसा और ईसाधर्म व्यौरा—चौपाई

रजगुण तमगुण जहां मिलाई । मूसाधर्म और ईसाई ॥ होम यज्ञ तौरेत बखाना । यथा वेदविधि कीन प्रमाना ॥ सागपात जैसे तरकारी । तैसे नर मद मांसु अहारी ॥ मानुष घातसे पातक माना । इतर जीव सब साग समाना ॥ मूसा धर्म यहूदी धारा । यहि मतको नहिं अधिक पसारा ॥ मूसाके कोइ शिष्य न रहेऊ । ताते धर्म कि बृद्धि न भयऊ ॥ अबीरामको जो सन्ताना । मूसाधर्म करे परमाना ॥ सतगुणरूप आहि ईसाई । क्षमा शीलतामें अधिकाई ॥ छल बल रहित दीनता धरही । उज्ज्वल किया शौच आचरही ॥ मद्य मांसको करे अहारा । ताते तमगुणमय व्यौहारा ॥ भजन अरु दान पुण्यकर थोरा । अधिक रजोगुणते चित जोरा ॥ क्षमा शांति सब औगुण ढकई । भर्मभूत तजि प्रभु दिशि तकई ॥ ईसा शिष्य साखा बहु भयऊ । पृथ्वीपर जहैं तहैं रमि गयऊ ॥ देश देशमें धर्म प्रचारा । ईसा गुण सब ठौर उचारा ॥ जेहि औसर यह धर्म चलाई । नर भोले थोरी चतुराई ॥ थोरी विद्या बहुत निरअक्षर । धर्मकी गति जाने तब कहैं नर ॥ थोरे ही उपदेशके करते । सब ईसाई धर्मको धरते ॥ यूरूप सबही भयो इसाई । देश एशिया गुण अधिकाई ॥

१०९

जीवधर्मबोध

( २०१७ )

थोरे मनुष्य गह्यौ मत ईसा । हिंदू स्थान धर्म धुरदीसा ॥ चरित इहां पादरी आये । विरले जीवहि धर्म गहाये ॥ राज भयौ अंगरेजको जबते । भये अधिक ईसाई तबते ॥ मूसा ईसामतके माहीं । स्वर्ग नर्क निर्णय कछु नाहीं ॥ आतम गुण अरु ज्ञाना ज्ञाना । कछु नहिं इनमें कीन बखाना ॥ मोटा ज्ञान धर्म बतलाई । पुण्य पापकी थाप थपाई ॥

इति मूसाईसा

अथ महम्मद धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण जहाँ रजोगुण पेला । धर्म महम्मदको यह खेला ॥ बिन अपराध जो मानुष मारे । मारि काटि निज धर्म प्रचारे ॥ यह गुण मुसलमानमें कहई । यक अच्छाहकि भक्ति सो गहई ॥ दुतिये गुण इनमें बड़ भारी । अभ्यागत आदर अधिकारी ॥ दान पुण्य अरु उज्वल कर्मा । चित्त उदार महम्मद धर्मा ॥ भये महम्मद ऐसे दाता । आपअलूने साग जो खाता ॥ माल कोरोनको लुटवाई । सह्यौधुरक्सेकाडुःख अधिकाई ॥ वेद धर्मको जैसे देखा । मता महम्मदको तस लेखा ॥ कथा कहानि अधिक मिलाई । सुनी गुणी बहु बात बनाई ॥ स्वर्ग नर्क महि मध्य कहानी । धर्म महम्मद निर्णय ठानी ॥ आत्मवाद कछु ज्ञानको भेदा । जपतपशमदम आदिनिवेदा ॥ मोटा ज्ञान तीन हूको पद । मूसा ईसा धर्म महम्मद ॥

इति महम्मदधर्म :

अथ शक्ति धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

धर्म तमोगुण जो लखि पाया । शक्ती धर्म आदि है माया ॥ भवसागर जिन कीन पसारा । नारीते यह सब संसारा ॥ शिव अरु शक्ती रूप द्वै कीन्हा । दोहू रूप मायाको चीन्हा ॥

(२०१८)

बोधसागर

११०

जब संचट होय दोहु रूपा । ताते जीव परे भ्रम कृपा ॥ द्वंदरूप मायाको खेला । ताते जीवको ज्ञान सकेला ॥ ज्ञानते माया पंथ बिरोधी । भवसागर पद जीव प्रबोधी ॥ हिंसा कर्म बुद्धि जिव घाटी । ज्ञानद्वारे पर दीनो टाटी ॥ भोगे भोग भोगमें रहई । भोगवासना चितमें गहई ॥ भोगमें भर्मि रहा सब लोगा । आवे जाय सहे सो सोगा ॥

इति

अथ अघोर धर्मव्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण पर तमगुण सरसाई । धर्म अघोर परम कठिनाई ॥ नर पशु जीव सकल धरखाही । धर्म विचित्र कहो कह जाही ॥ डुराचारको अन्त अघोरी । जिमि अचार वैष्णव घोरी ॥

इति अघोरधर्म

अथ विचारणीय वार्ता

दोहा—येते धर्म बखानेछ, इनते कहूँ जो और । सकल त्रिगुणमय भक्त हैं, जक्तमाह सब ठौर ॥ त्रिगुणातीत जो कोय कहे, त्रिगुणातीत न होय । कहनको त्रिगुणातीत हो, त्रिगुणमें बांधा सोय ॥ जीवनसुक्त विदेह जो, सब तिरगुणके फन्द । सार शब्द लहि पार हो, तब जिव होय अनन्द ॥

चौपाई

जेते धर्म प्रचारक होही । कहो न जाय कहै का ओही ॥ जिमि नृप थापे देशन देशा । धर्म प्रचारक जगमें ऐसा ॥ एक प्रानि दुतिये मत खंडा । अपनो धर्म धारा प्रचंडा ॥ यक जकती यक भकती पाला । दोनों ते प्रभु बसे निराला ॥

१११

जीवधमबोध

( २०१९ )

बिन गुरु गम सो लखो न जाई । कोटिन विधिकिन करे उपाई ॥ यह दश वस्तु आपमें देखो । पांच तत्त्व गुण तीन विशेषो ॥ ब्रह्मजीव माया कहि दीनी । एकते भिन्न न दुतिया कीनी ॥ सदा काल सो रहै सघट्टा । कबहु न बिलगहो तिनको ठट्टा ॥ सब रचना इनहीते होई । इनको पूजाकर सब कोई ॥ प्रथमैं पृथ्वीकी है पूजा । मूरत थाप आपते दूजा ॥ आठ प्रकारको प्रतिमा कीने । ताहि ध्याय जिव ईश्वर चीन्हे ॥ दुतिये जलकरि ईश्वर ध्यावै । योग कियाआदिक मनलावै ॥ शौचअचार आदिक सब जोई । वरुण देवकी पूजा होई ॥ तृतिये अग्नि हरी सेव अनूपा । यज्ञ होम धूप आदिक दीपा ॥ चौथे पौन देवकी सेवा । प्राणायाम आदिकको भेवा ॥ पंचम शून्य समाधि बखानी । पुनिरिगुणपुनि आदि भवानी ॥ तिनपर ज्योति निरंजन जागे । सकल जीव भक्तीमें लागे ॥ वेदमें यह पूजा बतलाई । वरुण चन्द्र इंद्री रविराई ॥ अग्नि सरस्वती पृथ्वी पौना । तनमें सब रहते लख तौना ॥ थूल वस्तु येती दरसाई । सूक्ष्म थूलमें रही समाई ॥ थूलमें सूक्ष्म सूक्ष्ममें थूला । सूक्ष्म सर्व थूलको मूला ॥ सो सूक्ष्म मोहिते नहीं न्यारा । मोही पाहि बसे मो प्यारा ॥ जेती पूजा जगके माहीं । सो सब अपनो दूसर नाही ॥

छन्द अस्कंध

दिलदेउलमें देव पुरातन पूज पुजारी तारा है । दिलहीमें पूजा सामग्री दिलही ठाकुरद्वारा है ॥ कहुँ तीरथ कहुँ मूरत थापै सबपरपंच पसारा है । मनका फेरन कोई जाने मन का फेरत हारा है ॥ उठत बैठत परत रातदिन कानो अंगुली डारा है ।

( २०२० )

बोधसागर

११२

रोजा और नमाज गुजारे पुतली स्वांगसँवारा है ॥ मस्जिद चूनाकंकर है क्यों सौ सौ टक्कर मारा है । दिलको खोज देवानेमोछा दिल अछह दीदारा है ॥

चौपाई

अहं अहं ब्रह्म बोलब नहीं जोगू । ब्रह्मकी गति जाने कहैं लोगू ॥ अहं ब्रह्म ब्रह्मा जो भाषा । अपने कर्मको ज्ञान न राषा ॥ बिन विचार सबही जिव भटके । सतगुरु त्याग भर्मपुर अटके ॥ भेडर चाल गहै संसारी । रंच न हृदये बुद्धि विचारी ॥ जाने कहवां पुरा पतंगा । दीपक परे होय तन भंगा ॥ विछाजालजौरखग लखि पावत । दाना चुगनसो कबहुँ न आवत ॥ बिना विचार धर्म जिव धरही । सब मिलि बहुरि बड़ाई करही ॥ सदा काल जो करे विचारा । तिनके हृदय होय उजियारा ॥ रावनको जो राक्षस कहेऊ । वैर भाव द्विज ताते गहेऊ ॥ ब्राह्मण चार वर्ण शिर मौरा । तासु वचन प्रमाण सब ठौरा ॥ झूठ होयकै सत्य बखाना । विप्र वचन सब करे प्रमाना ॥ रावन रूप विप्र अस कहेऊ । नौनर यक खरको सिर गहेऊ ॥ विप्र रामलीलाकी वारी । रावनकी जब मूर्ति सँवारी ॥ नौशिर नर अकार बनावै । यक शिर गर्दभको देखलावै ॥ गर्दभको जौ शीस सँवारा । सो सब शिरनको ऊपर धारा ॥ गर्दभशीस भले सब देखे । निंदा हंसी होय यहि लेखे ॥ मनुष्यते रावन राक्षस भैऊ । खरनिश्चय पुनि मिश्रितकियऊ ॥ ऐसो विप्र वचन प्रमाना । चार वर्णके लोगन माना ॥ जस रावनमें औगुण मानी । रामचन्द्र तिमिसबगुणखानी ॥ जती रावणता गुणगाहा । सीतारामहि कबिन सराहा ॥ रामचंद्र निजु सखा समेता । गुणगणअतुलित कहा कविकेता ॥

११३

जीवधर्मबोध

( २०२१ )

तिमि दोषी दशकंध समाजा । नरगह सत जा कह कवि राजा ॥ परवत सम रावन बतलाई । मृदुल मनोहर सिय रघुराई ॥ शाह सिकन्दर जो यूनानी । ताने विजय कीन युग जानी ॥ जीत्यौ महि रिपु सागर बंदर । दोय शृङ्गशिर गह्यो सिकन्दर ॥ पारस देशको बकरा चीन्हा । जब सो भूमि विजयनृप कीन्हा ॥ शीसपै शाह गह्यो सो गहना । शृंगसिकन्दर ताको कहना ॥ शृंगसहित सिकन्दर सोई । तिमि रावन दशकन्धर होई ॥ यथा सिकन्दर शृंगनवाला । तिमि रावन बीसभुज दशभाला ॥ सहसबाहु ब्रह्मा चतुरानन । विष्णु चतुर्भुज अरू षट आनन ॥ पंचमुखी शिव आदि अनेका । जीवन जाने बिना विवेका ॥ ऐसहि द्रन्द परा संसारा । झूठ सांचकर कौन विचारा ॥ कालभेदको ऐसहि देखा । समुझे बिना करे सब लेखा ॥ द्रापर अन्त भो कलियुग आदी । कौरौ पंडौ भये विषादी ॥ करणराय जब बिनती कीने । परशुरामसे विद्या लीने ॥ परशुराम रघुराम जो दोई । एकै समै दोहुनको होई ॥ जाशिवन्त दुबिदा हनुमाना । शृंगी ऋषि आदिक नर नाना ॥ राजा मय मेरटको जोई । रावन शशुर कहावै सोई ॥ राजा जनक अरु सुनिमुखदेवा । व्यास वशिष्ठ जो भाषे भेवा ॥ इत्यादिक वृत्तांत बहु चाला । सो सब रामकृष्णके काला ॥ कालको भेद न कतहु मिलाया । जक्त जीव माया भरमाया ॥ झूठहु सत्य शुद्ध सो लागा । सत्यको झूठ जानी जिव त्यागा ॥

दोहा—आदम आधे दिवसलो, कीन बिहिस्त निवास । पांचसो वर्षसो अर्धदिन, महम्मद धर्मप्रकाश ॥ कालको मेल सिलै नहिं, सो मायाकी खोट । कहुं पलभरी कहुं वर्षदिन, कहु भासे युग कोट ॥

( २०२२ )

बोधसागर

११४

चौपाई

रावन बहिन बिचर वन वाटा । लक्ष्मण तासु नासिका काटा ॥ सो सुनि रावन कोधित भैऊ । छल बल करि सीता हरि लैऊ ॥ कोई न लक्ष्मण दोष लगावै । सब औगुण रावणको गावै ॥ निश्चर कीश शृंग टुम धारी । रावन रघुपति सैन सँवारी ॥ विविधि भांतिको बिना समाजा । नरगह सत जो कह कविराजा ॥ राम शत्रु रावण जिमि राक्षस । कृष्णके कंसादिक वैरी तस ॥ कंस कृष्ण मामा जग जाना । कर्महि राक्षस और न आना ॥ बेद महाभारत अस कहेऊ । कौन देवता मोहित भैऊ ॥ नाम केसरी वानर चीन्हा । तासु नारिसंग भोग सो कीन्हा ॥ ताते हनुमान प्रकटाना । सोई कौन पुत्र जगजाना ॥ बुधिवंतो मन देख विचारी । वानरके नहिं कोई नारी ॥ पशु पंछी कोई ब्याह न जूटी । जेहि संगर मैं सो तासु बधूटी ॥ पौन देवता गुण गण धामा । पशुलखिसोंकिमिहोय सकामा ॥ जांबुवंत जम्बूको राजा । रिच्छप रामके संग विराजा ॥ कृष्णशशुर पुनि ताहि बखाना । दियौ ताहि निज कन्यादाना ॥ रीछकी पुत्री रीछिन होई । मानुष संगमेलि नहिं कोई ॥ राक्षसवंशी वानर वंशी । रीछ नाग बछरा खरवंशी ॥ इत्यादिक सब गीत कहावै । बिन जाने कोई भेद न पावै ॥ ब्रह्मन ऐसी कथा उचारा । जैनबुद्धि विष्णु औतारा ॥ तनधरि असुरनको भरमाया । यज्ञ करन से तिन्है हटाया ॥ असुरन यज्ञ त्यागि जब दैऊ । सो सब अबल ताहिते भैऊ ॥ करि करि यज्ञ विप्रबल पाई । असुरनको तब मारि हटाई ॥ जैन बोध दायामय धर्मा । तिनके कहा असुरके कर्मा ॥ कर्ता पुरुष जो परम त्रिवेकी । सबके संग करै सो नेकी ॥

११५

जीवधर्मबोध

( २०२३ )

काहूको नहीं सो भरमावै । राग द्वेष नहीं ताको भावै ॥ ब्रह्मन वैर जाहिसे गहेऊ । वेदविरोधी असुर सो कहेऊ ॥ पशुपंछी नरको दुःख देही । असुर कर्मकर असुर है येही ॥ कारे राते गोरें अंगा । असुर बखाने नाना ढंगा ॥ असुर कर्म जब जो नर त्यागा । सो अवश्य सुर होय सुभागा ॥ लघु दीरघ तन सबही नरके । होहि सुरासुर कर्महि करके ॥ अजौ विप्र जैनीके द्रोही । औसर पाय देत दुःख ओही ॥ तिर्थकरकी मूर्ति जो आही । बाहर जैन निकास जो ताही ॥ ब्राह्मण तब असक्रोध गहाई । पहुँचै ले निजु सरा सहाई ॥ प्रतिमाके ऊपर तेहि बारा । पाथर ईंट करै बौछारा ॥ मुसलमान अस बचन सुनाया । कतल हुकुम अछाहते आया ॥ जो अछाह कतलपै राजी । तो एकै मत जग किन साजी ॥ महम्मदमत जगमें फैलावत । और सकलमत दूर बहावत ॥ जो कलाम अछाह कहाई । यह कुरान असमानते आई ॥ सो अछाह निकटकै कहाई । रह्यौ चराचरमें सो पूरी ॥ सोई कुरान ऐसो प्रकाशी । शहर गते प्रभु निकट निवासी ॥ कंठ किनसते निकट जो रहई । पुनितेहिकिमिअकाशपरकहई ॥ शहरगते हरि निकट बताई । तासु कलाम दूर किमि जाई ॥ अस नरें अछाह बतावै । किमि कलाम असमानते आवै ॥ जहाँ अछाह तहाँ अछाह कलामा । अछाह निकट दूर कह कामा ॥ जो अछाहको नहीं लखि पाया । तेहि कलाम असमानते आया ॥ जो अछाहको नहीं पहिचाना । किमि ताकी कलामको जाना ॥ जबैह कतलते प्रभु नहीं राजी । भ्रमकरि भूले पंडित काजी ॥ कोई कह प्रभु मैं आखिन देखा । चर्मदष्टिको मिथ्या लेखा ॥ चर्मदष्टि सब माया भासा । जो भासा सो सकल विनासा ॥

( २०२४ )

बोधसागर

११६

कोइ कह मैं कोई ठौरमें गैऊ । प्रभुके संग बातकही भैऊ ॥ कोई कह मैं प्रभु सपने देखी । कोई कहै घटही मैं देखी ॥ कोइ कह मो प्रति भै नभवानी । झूठ साच मैं ताते जानी ॥ कोइ कह मैं लखि ज्ञानके द्वारा । सो कस जस बिजुली चमकारा ॥ झूठ सांच भल नहीं लखि पावै । और बात कह्यु और बतावै ॥ यह सब जिवकी भर्म कहानी । विरला कोइ ईश्वर पहिचानी ॥ बिना ज्ञानके सब यह बाते । ज्ञानभये भ्रम रहै न ताते ॥ जो कोइ साधु ज्ञानके खानी । प्रभु इच्छा सब आपै जानी ॥ तिन्है न स्वपना नहीं न भवानी । नहीं कहैं अनतबतकही ठानी ॥ ज्ञान द्वार हरदम हरिदरसै । दूर जाय कह तापद परसै ॥ चार वर्ण ब्रह्मा परकासी । तिमि शंकर तनते संन्यासी ॥ शीसते पुरी देह निजु गहेऊ । पुनि भारती माथसे कहेऊ ॥ जीभनोकते सरस्वती जाय । गिरपर्वत दोऊ भुजा उपाय ॥ पसुलीते सागर तन गन्नों । दोहु जँघते बन आरन्नों ॥ दो पदसे तीर्थआश्रम तनधारै । शंकरसे प्रकटे इमि सारे ॥ जस बिचार जिवमाह प्रकासा । सो प्रतक्ष है ताको भासा ॥ केते ऐसे भये परपंची । छल करि ग्रंथ नयौ निज रंची ॥ छल बल करि निज नाम छपावै । जगमें इमि निज धर्म चलावै ॥ पूर्वाचार्य श्रेष्ठ मत धारी । ग्रंथको करता ताहि पुकारी ॥ श्रेष्ठ पुरुषको रचित विचारी । होय ग्रंथको आदर भारी ॥ अकबरशाह वोजीर जो फैजी । नयौ धर्म परचारक पैजी ॥ ताने नयौ कुरान बनाई । एक वृक्षके बीच छपाई ॥ अकबर शाहसे जाय सुनाया । मोकहैं राति स्वप्न यकआया ॥ तुमरे नाम नबूबत आई । है कुरान तरुमाह छपाई ॥ अकबरशाह अचंमित भयऊ । शीघ्र ताहि तरुतर चलि गयऊ

११७

जीवधर्मबोध

( २०२५ )

बृक्षको चीर कुरान निकारा । फेजी छल खुल्लिगो तिहिबारा ॥ ऐसे केते कपटी जगमें । करे बिगार धर्मकी मगमें ॥ पंडित कह पै पंडित नाहीं । विद्या देखि जीव भरमाहीं ॥ कठिन प्रपंच करे सो लोगा । विद्या पढ़ न भक्ति संयोगा ॥ विद्वज्जन हैं द्वैविधि वक्ता । एक भक्त यक जत्तको ठगता ॥ षट् पशु ऐसे कीन प्रमाना । प्रथमैं वेद पशुको जाना ॥ वेदादिक पढ़ि ग्रंथ अनेका । वेद पशु न हृदय विवेका ॥ दुतिय देवपशु गह सुर पक्षा । कह सुर श्रेष्ठ करे जग रक्षा ॥ तृतिये नर पशु ताको कहते । श्रेष्ठ मनुषको पक्ष जो गहते ॥ चौथे शास्त्र पशु शास्त्र ले बोले । पुनि पंचम पुराण पशु टोले ॥ छठे नारि पशु लंपट भाषे । ये षट्पशु विचार नहीं राखे ॥

दोहा-गुरुपशु नरपशु वेदपशु, त्रियापशु संसार । मानुष सोई जानिये, जाके हृदय विचार ॥

इति विचारणीय वार्ता

अथ धर्मसार वर्णन

दोहा-सर्व धर्म परमान यह, ईश्वर समरथ सत्य । किहि विधि सो प्रभु रीझई, कोइ न जाने गत्य ॥

चौपाई

शुभ कर्मनते हरि हर खाहीं । यह प्रमान सब धर्मनमाहीं ॥ शुभ अरु अशुभ कर्म द्वै राखी । दोनों कर्म धर्मते भाखी ॥ समरथ करता दोहुते न्यारा । ताकी गति को जाननहारा ॥ न्याय मिमांसा जैनी भाषे । केते ऋषि सुनि सोइ मद राखे ॥ जीव स्वच्छंद कर्म अधिकारी । जस चाहे तस कार्य सँवारी ॥ केते साधु कथै विपरीती । जिव नहीं सके कर्मकुलजीती ॥ कर्ताकी गति काहु न जाना । कथे अनेकन वेद पुराना ॥

नं. ११ बोधसागर-

( २०२६ )

बोधसागर

११८

जापर कृपा करे सो साईं । ताकी बाँह गहे बरियाई ॥ ब्रह्मानंद बनावै ताही । सबते श्रेष्ठ होय जिव वाही ॥ बहुविधि जिवशुभकर्म जो करई । बिन प्रभु दया कार्य नहिं सरई ॥ बार बार सो प्रभुहिं नमामी । सर्व समर्थ सर्वके स्वामी ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

अवधू कुदरतकी गति न्यारी ।

रंक नेवाज करे वह राजा भूपति करे भिखारी । वाते लोग हरफ नहिं लागे चंदन फूल न फूला ॥ मच्छशिकारी रमै जंगल बिच सिंह ससुंदर झूला । रेडरूख भयौ मलयागिर चहुँदिश फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखे अन्ध तमासा । पंगा मेरु सुमेरु उलेंचै त्रिभुवन सुक्ता डोले । गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशे अनहद बानी बोले ॥ आकाशहिं बांधि पताल पठावै शेष स्वर्गपर राजे । कहैं कबीर राम हैं राजा जो कछु करे सो साजे ॥

चौपाई

महागृह सुनिवर तप कीने । अंत नर्कमें बासा लीने ॥ पतित जौ नर्क भोगवे लायक । कृपा कीने कीन सुरनायक ॥ जौ मैं कर्मकरन समरथा । ज्ञानसुक्ति तौ सब ममहत्था ॥ मैं हौ कौन कर्म है काको । जीव नहीं जाने परिपाको ॥ जौ यह जाने मैं कछु नाहीं । तौ अभिमान दूर दुरि जाहीं ॥

सत्यकबीर-वचन

साखी-कबीर-पैठा है सब घटनमें, बैठा है संचेत । जब जैसी गति चाहत है तब तैसी मति देत ॥ कबीर-बहुबंधनते बांधिया, एक बेचारा जीव । जीव बेचारा क्या करे, जौ न छोड़ावै पीव ॥

११९

जीवधर्मबोध

( २०२७ )

कबीर-मनको मनोरथछोडिदे, तेरा किया न होय । पानीमें धिंव निकले तो, रूखा खाय न कोय ॥

नानकशाह वचन

करै करावै आपै आप । मानुपकै कछु नाहीं हाथ ॥ जो कहै कि मैं कुछ कर्ता । फिर फिर गर्भ योनिमें फिरता ॥

चौपाई

मैं कछु नहिं कछु है मेरा । अहमित जे अज्ञानते घेरा ॥ जो कोई पायौ ज्ञान अमोला । अहंब्रह्म आपा लखि बोला ॥ ताहूकी यह दुर गति देखे । लखि नहिंपरतअलखयहिलेखे ॥

सत्यकबीर वचन-रेखाता

मालिन पुकारे हे पिया है हे साहेब तूने क्या किया ॥ यक बून्द लज्जत कारने मन्सूर सूली यौ दिया ॥ जल जलकि रोवै माछरी बनबनके रोवै मोरया ॥ महलोकि रोवै बीबिया अल्लाह इलाही क्या किया ॥ कायाके अंदर खोजिले छज्जेमें तेरा जीव है ॥ कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुजहिमें तेरा पीव है ॥

चौपाई

जस ईसाकी कथै कहानी । तस मन्सूरकेरि गति जानी ॥ दोनोके मरनेकी बारी । प्रकटे केते चीन्ह भयकारी ॥ ऋषि सुनि जैसे करनी करही । तैसी हानि लाभमें परही ॥ ज्ञानी ध्यानी प्रभु नहिं जाना । पाय कर्मफल सुख सब माना ॥ कबहु कबहु विपिरीति देखावै । उत्तम कर्म तुच्छ फल पावै ॥ जैसो नीक नाथको लागा । तैसोई तप फल जिव मागा ॥ कुंभकरन तप करि हरि टेरी । मांगसि नींद माष षट्केरी ॥ बारह लक्ष वर्ष तप भारी । कर इबलीस हदीस पुकारी ॥

( २०२८ )

बोधसागर

. १२०

कछु नहीं ताको बस तहँ चाला। अंतकाल तेहि नकीमें डाला ॥ जीवकि वसमें जो कछु रहता। तौन सुकर्म नीच गति गहता ॥ वेशुवा बहुदिनको लेआयो। ईश्वर कृपा ताहि परछायो ॥ जबकन आनदेशमें आया। तह बल्लाम साधु यक पाया ॥ तीनसौ वर्ष कीन तप जोई। जो कछु कहै सत्य सब होई ॥ बाद येशुपासे सो ठानी। तीनसौ वर्षकी तप विनसानी ॥ जब जहि जस चाहे तस करई। जीव जतन कछु काज न सरई ॥ किनको नाथ दीन बरदाना। निज भ्राता पर हो जय माना ॥ जीत्यौं प्रभु आज्ञा अनुसार। कोई न भा दोषी हत्यारा ॥ मूसा प्रभुकी आज्ञा पावो। चलि फिर उन भूप समुझावो ॥ देय यहूदिनको सो जाना। पुनि अस वचन कहौं भगवाना ॥ मैं फिर उनको करों कठोरा। मूसा वचनसे मुख सो मोरा ॥ फिर उनहिय प्रभुकरि कठिनाई। मूसाको तब कहा बसाई ॥ को अस बली जो ताहि उबारा। प्रभु जेहि आप डुबावन हारा ॥ जैसे प्रथम भन्यकी बानी। हसन हुसेन मृत्यु इमि जानी ॥ कीन हुसेन युक्ति बहु तेरी। पहुंचे मृत्यु महि मरनकी बेरी ॥ यकदिन अस कौतुक बतलाये। महम्मद द्वै किताब ले आये ॥ यक किताब दहने कर गहई। दूजी बाम हाथमें रहई ॥ दहने हाथ किताब जो दिखावा। नाम बिहिस्तिनकोतहँलिरकवा ॥ जो किताब बायें कर ग्राही। नारख नाम लिखा तामाही ॥ प्रथमहिंते भे स्वर्गी नकीं। कुदरतकी गति जाय न तकीं ॥ प्रभु केकइकी मनि हरि लीनो। रामचंद्रको सो बन दीनो ॥ केकइको कह दूषन दीजै। हरिइच्छा किन अटक कहीजै ॥ बाबुल बुर्ज बनावन लागे। सब नर तिय तेहि उद्यम पागे ॥ ताते नहीं ईश्वर सुखपाई। सबकी बोल दियौ पटलाई ॥ बरने बेद उपनिषद साखी। देव दनुज दोऊ दल रन भाखी ॥

१२१

जीवधर्मबोध

(२०२९)

हारे असुर सुरन जय पाया । विजइन मन अभिमान समाया ॥ जब देवन कीने अभिमाना । ब्रह्मरूप तब तहँ प्रकटाना ॥ ऐसो तेजमई सो रहेऊ । कोईसुर नहिं सन्मुख है सकेऊ ॥ सब सुर अग्नि पौनको टेरी । तेहि औसर तहँ दोउ कर फेरी ॥ सब सुर अग्नि पौनसे कहेऊ । ब्रह्मरूप जो प्रकटे भैऊ ॥ हम सन्मुख है सके न ताही । तुम करि कृपा तासु दिग जाही ॥ तादिग पौनदेव जब गैऊ । ब्रह्म ताहिते पूछत भैऊ ॥ तुम हो कौन कहा तौ कर्मा । पवन देवता भाज्यौ मर्मा ॥ नाम पौन सुर मेरो होई । जो कुछ होय उडावो सोई ॥ तहां रही यक तृणकी ढेरी । ब्रह्मसो पौनको पौकहि टेरी ॥ वह ढेरीको देह उड़ाई । पौनदेवकर बल अधिकाई ॥ यक तृण तासु न सका उड़ाई । बलकरि पवनदेव थकि जाई ॥ लज्जित पौन गौन धरकीने । अग्निदेव पुनि तहँ पग दीने ॥ पूछै ब्रह्म कौन तू भाई । अग्निदेव निजु नाम सुनाई ॥ पूछै ब्रह्म कर्म तो काहा । अग्नि कहे मैं सब कुछ दाहा ॥ कहे ब्रह्म तृणढेर जलावो । अग्निदेव वह जोर लगावो ॥ तृण यक भस्म न सो करसकेऊ । जोर लगाय अग्नि तहँ थकेऊ ॥ तब लजायके अग्नि सिंधारा । ब्रह्मा सो गुप्त भयौ तेहि बारा ॥ देवी प्रकट भई तेहि काला । देवनसे कहा बचन रसाला ॥ तुम अभिमान भंजवे कारण । ब्रह्मस्वरूप कियौ निजु धारण ॥ तुमरे मन हंकार जो आया । हम असुरनको मारि हटाया ॥ तुमरो कियौ होय कछु नाहीं । हानि लाभ विधिकी बस आही ॥ सर्वसमर्थ सर्वको दाता । ताकी गतिनहिं लर्यौ विधाता ॥ सो सबहीको खेल खेलावै । वाजीगर गतिको लखि पावै ॥ सबहीको जिन गर्व प्रहारा । लखि नहिं परत अलख करतारा ॥

(२०३० )

बोधसागर

१२२

बल वीरज विद्या चतुराई । बाजीगरको खेल् बनाई ॥ तीन देव जेते औतारा । कर्मके बन्धन नाचै सारा ॥ नाचै ब्रह्मा नाचै विष्णू । नाचै शंकर नाचै जिष्णू ॥ नाचै आप निरंजन ज्ञानी । तन धरि नाचै आदि भवानी ॥ नाचै ब्रह्म रुद्र हरि नारी । पीर पयम्बर नाचै झारी ॥ सिद्ध साधु सुर नर मुनि नाचै । सतगुरु कृपा सन्त कोई बाचै ॥ अहंकार करिके अज्ञानी । चाहत हरिमाया तरि जानी ॥ एक तपीकी कहो कहानी । जो अज्ञानते तप दृढ़ ठानी ॥ सोनिज मन असकीन विचारा । तपकरि चल हरि माया पारा ॥ ऐसी अपनी देह बढ़ावो । माया लंघि ब्रह्म मिल जावो ॥ ऋद्धि सिद्धि बल तामें जागा । तप करि देह बढ़ावन लागा ॥ महादीर्घ देही जब कीने । ब्रह्मचिंतवनमें चित्त दीने ॥ बढ़ तन ब्रह्म प्रभा परशनमें । अंग उत्तंग भंग मैं छनमें ॥ ब्रह्म प्रभाको कीन जो ध्याना । ताछन बढ़ा वपुष बिनसाना ॥ महादीर्घ तन है गिर परेऊ । पुनि सो मच्छरको तन धरेऊ ॥ घासनमें सो कियौ बसेरा । फिरत एक मृग वनमें हेरा ॥ तब ताको मृग लात जो लागा । ताते सो मच्छरतन त्यागा ॥ सुरति मसक मृग माह समाई । मच्छरतन तजि मृगतन पाई ॥ तेहि मृग मारन चले शिकारी । आय ताहिपर शस्त्र प्रहारी ॥ जब मृग निज तन त्यागकराई । बधिकमें ताकी सुरति समाई ॥ ताते बधिक भयौ मृग सोई । एक दिन वनमें विचरत होई ॥ विचरत बनहि मिले मुनि एका । ज्ञान दिये तेहि सहित विवेका ॥ मुनि उपदेश बधिक जो पाई । बहुरि सोभक्ति भाव मनलाई ॥ करि हंकार कर्म जो करहीं । तिनको कबहु न पूरा परहीं ॥

१२३

जीवधर्मबोध

( २०३१ )

दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय । बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥

चौपाई

वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥ वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥ महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥ त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥ जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥ मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥ जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥ मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥ कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥ जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥ जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥

रामचंद्र वचन

दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत । मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥

चौपाई

भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥ सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥ सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥ नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥ विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥ जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥