भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2080, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2080

( २००२ )

बोधसागर

९४

राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥ जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥ उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥ लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥ प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥ भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥ चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥ प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥ जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥ दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥ जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥ ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥ ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥ अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥ सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥ येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥ जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥ वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥ भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥ केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥ नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥ कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥ ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥ तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥ तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥