कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९८१ )
चौपाई
जो दीसै सबही विनसाई । जो विनसै सो जिव न कहाई ॥ जीव सोई जीवै तिहुकाला । जड़ चेतन ते सदा निराला ॥ आप मानि बंधनमें आया । भ्रमकरि तत्त्वमसी ठहराया ॥ तत्त्वमसी तिहुँपद है जोई । आवागौन मूल है सोई ॥ ततपद ईश्वर त्वं जिवरासी । असि पदक है ब्रह्म अविनासी ॥ ततपद ज्ञान है त्वं अज्ञाना । असि पद वेद ब्रह्म अज्ञाना ॥ वस ब्रह्मांड ब्रह्मसो ईसा । जिव अभिमानी पिंडमें दीसा ॥ असि पद जो दोनोंमें सनई । यमअनंद कछु कहत न बनई ॥ ज्ञानी अज्ञानी विज्ञानी । ततसागर त्वं सर असि पानी ॥ नामरूप मिथ्या है दोई । आत्मा एक जल सबमें सोई ॥ मानन्दी यह तीन प्रकारा । मानि मानि निज बन्धन डारा ॥ यही तीन है जिवको फांसा । षट्देहीमें कीनो बासा ॥ दोविधि ज्ञान द्वैविधि अज्ञाना । दोय भांति विज्ञान बखाना ॥ यक विशेष अपरोक्ष बतावो । दुतियोको परोक्ष कहि गावो ॥ निर उपाधि अपरोक्ष बखाना । सहित उपाधि परोक्ष प्रमाना ॥
इति
अथ त्वंपद द्वैभांतिको अज्ञानवर्णन-चौपाई
जो विशेष अपरोक्ष कहावै । विषयी जीवनके मन भावै ॥ विषय आसक्त जीव जब रहई । जाति पांति कुलकानि न गहई ॥ भोग मदामिष परतिय संगा । विषयिन सङ्ग अनंग तरंगा ॥ वेद शास्त्र मानै नहीं कोई । गति अपरोक्ष कहावे सोई ॥ सो अपरोक्ष दोय विधि वरना । परइच्छा निज इच्छा चरना ॥ परइच्छा जो हो अज्ञाना । सो समान अधिकरण बखाना ॥ निज इच्छा अज्ञान गहीजै । सो विशेष अधिकरण कहीजै ॥