भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2066, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2066

(१९८८)

बोधसागर

८०

ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा । निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥ ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥ श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥ आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया । सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥ आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई । झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥ छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है । सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥ परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है । सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥

इति

अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई

आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥ पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥ दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥ पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥ प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥ पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥ जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥ तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 2066, कुल 2136 में से · BharatKosha