भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९८९ )

तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥ सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥ सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥ बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥ प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥ देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥ दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥ सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥ तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥ तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥ चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥ वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥ इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥ कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥ हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥ तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥ जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥ लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥ लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥ लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥ वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥ काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥ वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥ देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥ इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥