कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १९९० )
बोधसागर
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आवत देख जो विषयबयारी । इन्द्री पटल सो देहि उघारी ॥ विषयानन्द जीव जब होई । तब शुभ करनी करे न कोई ॥ जब चहुलाज लंघि जिव जावै । बड़भागी कोइ प्रभु पद पावै ॥ अन्नमय यह कोष बखाना । जामैं जक्त जीव गल ताना ॥ प्राणमयी कोष याके आगे । विविधिप्रकार पौन संग लागे ॥ प्राण अपान समान उदाना । व्यानो नाग कूर्म कहि गाना ॥ किर्कल देवोदत्त धनंजय । ये सब पौन हैं कोष प्राणमय ॥ जेहि औसर जिव ऐसो कहई । प्राण हमारो तीक्ष्ण बहई ॥ प्राण पौनको स्वतह सुभाऊ । आपासो आरोप कराऊ ॥ गुदा अपान प्रवेश कराया । पवन सुभावन जीव सुभाया ॥ हृदय समान उदान सिरोई । व्यान अन्नपाचक है सोई ॥ नाग डकार कूर्म हग खोले । किर्कल छीक स्वतह सो बोले ॥ देवदत्त जसुहाई पूजै । मृतक शरीर धनंजय सूजै ॥ इतने इतर पौन बहुवादी । अंगफर्कन अफरन हिचक्यादी ॥ पौन कर्म सब मानै आपा । कोष प्रानमय बंधन थापा ॥ कोष मनोमय तासु अवांतर । पुनि हंकार कहे ताते पर ॥ शुभ और अशुभकर्म जो कछु कर । पुन्य पाप व्यौहारादिक नर ॥ सो सब मन इन्द्रीके करतब । कोष विज्ञानमयी कहिये अब ॥ पंच ज्ञान इंद्री छठये बुधि । तासु अवांतरचित्त सहित सुधि ॥ परमारथ सब उत्तम करनी । सो सुभाव सब इनको बरनी ॥ जिवसो कर्म आपनो धरई । कोष विज्ञानमय बंधन करई ॥ पुनि अनंदमय कोष पर तेही । बुद्धिको ऐसो ज्ञान भयो जेही ॥ हौमैं करि जिव करे बखाना । आपको बड़ अनंद हम जाना ॥ सो अनंद बंधन जिव केरा । कोष अनंदमयी यह टेरा ॥ पांचो कोष अवस्था पांचो । जागृतरूप अनन्तमय बांचो ॥