भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९८३ )

यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥ नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥ दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥ अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥ परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥ याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥ द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥

इति त्वंपद अज्ञान

अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई

ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥ सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥ ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥ निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥ तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥ सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥ तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥ सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥ सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥ जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥ होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥ निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥ सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥ त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥ ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥ यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥