भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९८४ )

बोधसागर

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तीन काल कोई नहिं भासा । त्रिपुटी सकलको होय बिनासा॥ ज्ञानाज्ञान गेय नहिं कोई । ध्याता ध्यान ध्येय ना होई ॥ आपन भाव रहै तिहुँ काला । द्वैत उपाधि नास्ति जंजाला ॥ यही ज्ञान अपरोक्ष कहावा । सो ज्ञानी शिवरूप बतावा ॥ योग समाधिसे जो मन मारे । मध्यम पक्ष सो वेद उचारे ॥ तामे कसर वेद निर्धारा । परो अविद्याको अंधियारा ॥

इति तत्पद

अथ अस्तिपद विज्ञान द्वैविधि वर्णन चौपाई

जानि बूझि जड़ वृती जो धारा । जस उनमत्त महा मतवारा ॥ यहिविधि सहजदसा जब गहई । एक अनेकन भ्रम कछु रहई ॥ महदानन्द मगन मन होई । याहूमें प्रकार है दोई ॥ जहँ विज्ञान दशा रह आई । सो विज्ञान हंस कहलाई ॥ कहवे मात्र बानीको ज्ञाना । सो मिथ्या विज्ञान बखाना ॥ दुतिये सो विज्ञान कहाई । जहां तहां आपै रह छाई ॥ द्वैतभाग कहुँ नहिं रहई । कारन कारज आपै रहई ॥ आपै बोले आप बोलावै । आपै डोलो आप डोलावै ॥ करे करावै आपै आपू । द्वैतभाव कतहुँ नहिं थापू ॥

इति

अथ स्वसंवेदमते चतुर्थपारखपदवर्णन-चौपाई

यहि विधि तीन भूमिका भाषी । चौथि भूमि पारखपद राखी ॥ तीन भूमिका है भ्रम भासा । चौथे परख काटे जिव फांसा ॥ तत्त्वमसीको ज्ञान जो गहता । तावमसीसे न्यारा रहता ॥ जैसे गुँगेने गुड़ खाया । बाक बिना कह स्वाद बताया ॥ तत्त्वमसाको ज्ञान जो धारी । जानि बूझि सो भयो सुखारी ॥ गुंगा गुड़को स्वाद जो गहई । सो तो गुड़से न्यारा रहई ॥

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