भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९८५ )

स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥ नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥ मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥ तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥ झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥ जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥ सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥ घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥ छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥ चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥ छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥ पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥ पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥

सत्यकबीर बचन—शब्द

यह जग पारख बिना भूलाना । निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥ द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना । आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥ सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना । जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥ छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना । बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥ घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना । सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥