भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९८६ )

बोधसागर

७८

करहु विचार सकल मिलि ऐसो भेष विविधि बिधि बाना । कहै कबीर कोइ गुरुगम पावै पहुँचे ठौर ठिकाना ॥

इति पारखभूमि

सोरठा-ज्ञानको मूल विचार, बिन विचारको ज्ञान गह ।

हृदय घोर अँधियार, सार असार न परखकर ॥

ताते बारहि बार, मनमें भूले विचारकर ।

कोहें को संसार, कौनि भाँति कहते भया ॥

करता कारण कौन, यह समूह जो दृश्य है ।

परखी लीजिये तौन, निज विचार द्वारे सकल ॥

देह सदा जडरूप, चित्त फुरित चैतन्य है ।

कर्मकिया भ्रमकूप, जड़ चैतनते मैं अलग ॥

चौपाई

अस विचार आवै हिय जनही । तब गह सार भर्म भय भनही ॥

जहैं लगि जगमें कथा कहानी । सकल जीवकी बात बखानी ॥

सर्वज्ञौ अलपज्ञ समाजा । जीवहि रंक जीव ही राजा ॥

जीवहि गिरही जीव भिखारी । जीवहि पुरुष जीवही नारी ॥

जीव ब्रह्म माया जगदीशा । जीवहि स्मर लक्ष्म रजनीशा ॥

जीवहि क्रूर सुगम सुरबाना । जीवहि जल थलमें बिहराना ॥

जीवहि काल युवा अरु बूढ़ा । जीवहि ज्ञानी जीवहि मूढ़ा ॥

जीव समष्टि व्यष्टि कहलावै । जीवहि पोषै सोष उपावै ॥

जीवते इतर कतहुँ कछु नाहीं । उर्थ मध्य अथ जीवहि आहीं ॥

जीवको सबहीं खेल विहारी । ताकी दशा अवस्था न्यारी ॥

ब्रह्म कहूँ बिन जीव न होई । जीव बिना जिव जिये न कोइ ॥

जौपै ब्रह्म जीव बिन होता । कैसे जीव बीज सो बोता ॥

जीवकर्म निर्जीव न करई । जीव बिना जिवकाज न सरई ॥